डॉ. एम. फीरोज़ खान
15 अगस्त 1947 को भारत स्वतंत्र हो गया, परन्तु अपने पीछे विषादों से भरा इतिहास छोड़ गया, उसकी छाती पर विभाजन की रेखा खिंच गयी थी। पाद हो जाने की खुशी, टुकड़ों में बँट जाने का ग़म सब ऐसा घुल-मिल गया, निर्य का संगीत मरघट के सन्नाटों में खो गया था, अजीब-सी नीरवता वातावरण में छा गई थी। मात को विभाजित करने के पीछे अंग्रेजों की घिनौनी साज़िश थी। अंग्रेजों की कूटनीति से मुस्लिम लीग तथा कांग्रेस में समझौता न होने के कारण स्वतंत्रता से थोड़ा पहले हिन्दू-मुस्लिम साम्प्रदायिक संघर्षों के परिणामस्वरूप बिहार, बंगाल आदि में एक सम्प्रदाय के लोग दूसरे सम्प्रदाय के निर्दोष लोगों की हत्यायें कर रहे थे, तभी 3 जून 1947 को अंग्रेज़ी साम्राज्य के प्रधानमंत्री एटली ने भारत के विभाजन की घोषणा कर दी, जिसके परिणामस्वरूप पूरे देश में आक्रोश की ज्वाला भड़क उठी मनुष्य मानवता का परित्याग कर बर्बर बन गया। विशेष रूप से पश्चिमी पंजाब के अल्पसंख्यक मुसलमानों के साथ भी बहुसंख्यकों ने दुर्व्यवहार किया।
विभाजन की त्रासदी और साम्प्रदायिकता का उभार
प्रो. बिपिनचंद्र के अनुसार साम्प्रदायिकता आधुनिक राजनीति के उदय का परिणाम थी। यह आधुनिक मध्ययुगीन, प्राचीन या 1857 के पूर्व की राजनीति से बिल्कुल अलग थी। हमारी परम्परा में साम्प्रदायिक धारणा ही नहीं थी।
असगर अली इंजीनियर भी मानते है कि साम्प्रदायिकता आधुनिक काल की परिघटना है, मध्यकाल की नहीं। मध्यकालीन राजा और शासक किसी धर्म से नफरत के कारण पूजाघरों को नष्ट नहीं करते थे, बल्कि अपने राजनीतिक स्वार्थों के कारण ऐसा करते थे। मध्यकाल की विशिष्टता धार्मिकता थी न कि साम्प्रदायिकता। धर्म साम्प्रदायिकता का मूल कारण नहीं है, यह केवल औजार है। साम्प्रदायिकता के मूल में राजनीति है।
साम्प्रदायिकता के पीछे धर्म नहीं, राजनीति
भारत विभाजन के पश्चात् हिन्दुस्तान में मुसलमानों की स्थिति अत्यन्त दयनीय हो गयी थी। भारत में रह जाने वाले मुसलमान अविश्वास और आक्रोश के पात्र नहीं बल्कि सहानुभूति और सहायता के पात्र हो गये। धार्मिक संवेदनशीलता का लाभ उठाते हुए भारत की भोली-भाली जनता को राजनीति का मोहरा बनाया गया, जनता इस कूटनीति से पूरी तरह अनभिज्ञ धर्म के नाम पर मरने-मारने को तैयार थी। पाकिस्तान के रूप में स्वतंत्र हुकूमत के बन जाने से भारत में रह जाने वाले मुसलमानों की समस्याओं का कोई समाधान न हुआ, बल्कि उनकी समस्याएं और बढ़ गयी।
आज़ादी मिलने के बाद से राजनैतिक दलगत प्रवृत्तियों का जो विकास हो गया है उससे बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक के अधिकार एक दूसरे के विरोध में आ गये हैं, भाषा के नाम पर कई राज्यों के अलग संख्या वाले समूह नैतिक अखण्डता का विरोध करने लगे। धीरे-धीरे ये विरोधी भावनाएं बढ़ने लगी एवं भारतीय एकता छिन्न-भिन्न होने लगीं, लोगों में क्षेत्रीय भावनाओं का विकास होने लगा। उपन्यास 'टोपी शुक्ला' में भारत की इसी अवस्था की ओर संकेत किया गया है कि भारत में नौकरियां जाति-पाँति के आधार पर दी जाती है, केवल योग्यता के आधार पर नहीं। इस संबंध में वे कहते हैं कि "भारत में कालिज हिन्दुओं का है, मुझे नौकरी नहीं मिल सकती।"
विभाजन के बाद भारतीय मुसलमानों की स्थिति
भारत-पाकिस्तान के बँटवारे ने आपसी सम्बन्धों में भी दरार खींच दी थी। मुसलमानों का भारत में रह जाना सामान्य हिन्दू वर्ग को स्वीकार न था। जब भारत विभाजित हो गया तो हिन्दूवादी संस्थानों ने यह प्रचार किया कि भारत की पवित्र भूमि पर मुसलमानों को रहने का कोई अधिकार नहीं है। भारतवर्ष पूर्ण रूप से हिन्दुओं का है और इस पर केवल हिन्दुओं को ही राज्य करने का अधिकार है।
जबकि भारत सर्वधर्म समान एवं धर्मनिरपेक्ष राज्य के रूप में अपने को घोषित कर चुका था। एक मुसलमान द्वारा हिन्दुस्तान में रह जाने पर प्रश्नचिह्न लगाने पर उसका क्रोधित होना स्वाभाविक था, क्योंकि मुस्लिम समुदाय में यह भावना जोर पकड़ रही थी कि मुसलमान सदियों तक हिन्दुस्तान पर हुकूमत करते रहे हैं और इनसे ही अंग्रेजों ने राज्य छीना था इसलिए अंग्रेज़ी हुकूमत ख़त्म होने के बाद मुस्लिम राज्य कायम करना उनका कानूनी हक है। इस सोच की वजह से भी साम्प्रदायिक दंगों में तीव्रता आई। राही मासूम रज़ा कृत 'टोपी शुक्ला' उपन्यास के पात्र इकतिदार के माध्यम से मुस्लिम वैचारिकता का यह आयाम रेखांकित किया गया है- "इसी का नाम हिन्दू शावनइज्म है। क्यों रहेंगे? यूँ पूछ रहे हो जैसे मुल्क तुम्हारे बाप का है।"
वास्तविकता यह है कि देश की मिट्टी और उसके कण-कण से प्रेम करने वाले मुसलमानों की कमी नहीं। इस्लाम धर्म एक ऐसा धर्म है जो सदैव से मनुष्य को उच्च संस्कार प्रदान करने हेतु क्रियाशील रहा है। इसमें राष्ट्र के प्रति प्रेम एवं दायित्व पर विशेष बल दिया गया है। पर विभाजन की त्रासदी ने मुसलमानों की देशभक्ति एवं राष्ट्रभक्ति के अस्तित्व पर अविश्वास की ऐसी रेखा खींच दी जिसे मिटाना आज तक सम्भव न हो सका। तत्कालीन गुसलमानों की मानसिक दशा को उपन्यासों में खूब उद्घाटित किया गया है। 'टोपी शुक्ला' उपन्यास में राही मासूम रज़ा ने भी विभाजन के पश्चात् मुसलमानों की क्या स्थिति थी, क्या सोच थी, इसे व्यक्त किया है- "अगर मैं मुसलमान हूँ तो इससे यह कहाँ साबित होता है कि मैं पाकिस्तानी हूँ या यह कि मैं हिन्दुस्तानी बनकर इस मुल्क में रहने को तैयार नहीं हूँ?"
देशभक्ति पर सवाल और मुस्लिम पहचान का संकट
भारत विभाजन के फलस्वरूप भारत की एकता खण्डित हो गई। मानवता धर्म का काला चश्मा लगाकर अँधी हो गई सोच-विचार की समस्त खिड़कियाँ मस्तिष्क ने बन्द कर ली। परन्तु ऐसे में भी राष्ट्रीय प्रेम एवं एकता को बनाये रखने की चाह कुछ हृदय में बनी रह गई थी। कुछ एक द्वितीय श्रेणी के विद्वानों ने तो स्वातंत्र्योत्तर भारत की दशा एवं विघटन की समस्या पर विचार करते हुए यहाँ तक कह दिया कि "जब तक भारतीय मुसलमान भारत को अपनी जन्मभूमि तथा अन्य धर्मावलम्बियों को अपने भाई के रूप में मानने को तैयार न होंगे, यह समस्या कदापि नहीं हल होगी।" निश्चय ही ऐसे विचार पूर्णतः पक्षपाती एवं संकीर्ण हैं। लोग साम्प्रदायिक असंतोष का पूरा कारण मुस्लिम वर्ग को घोषित करते हैं जबकि स्वतंत्रता के बाद बहुसंख्यक वर्गों द्वारा मुसलमानों को अनेकानेक अवहेलनायें झेलनी पड़ी हैं, इतना ही नहीं उन्हें देशद्रोही तक माना गया है कि मुसलमान देशभक्त होने पर प्रश्नचिह्न लगा ही और देशभक्त होने का दावा करने वाले ठेकेदारों को उसे चीख-चीखकर देशभक्त होने का प्रमाण देना पड़ रहा है। परन्तु यह मान्यता एक सीमित वर्ग की है। इसी प्रकार यदि कोई वर्ग हिन्दूवादी मानसिकता के लिये ज़िम्मेदार बताने का प्रयास करे तो यह भी उचित नहीं है।
धर्म कभी भी गुण-अवगुण का कारण नहीं बनता। हम अपने दोषों का पूरा-पूरा आरोप धर्म और जाति को मढ़ देते हैं। राही ने इसी बात को अपने उपन्यास 'टोपी शुक्ला' के पात्र अब्बू के माध्यम से स्पष्ट किया है- "गुण्डे-हिन्दू मुसलमान नहीं होते।""
पाकिस्तान के असर से भारतीय मुसलमानों की मुश्किलें
देश विभाजन के पश्चात् दोनों देशों के मध्य लगी द्वैष की आग बुझ न सकी। जिसका ऋण निरपराध भारतीय मुसलमानों को समय-समय पर भोगना पड़ा और पड़ रहा है। पाकिस्तान द्वारा उठाये जा रहे विरोधी कदमों का प्रभाव भारतीय मुसलमानों पर पड़ता है। यहाँ का बहुसंख्यक वर्ग अपना रोष भारतीय मुसलमानों पर उतारता है। इसी सत्य को 'टोपी शुक्ला' उपन्यास में राही मासूम रज़ा ने उजागर किया है- "क्या वह कल तक हमारे देश का एक अंग नहीं था? आदमी चाँद की तरफ क्यों देखता है? क्योंकि वह धरती का एक अंग है। हाँ, मेरा दिल पाकिस्तान में लगा रहता है, क्योंकि उनकी बेवकूफियों से हिन्दुस्तानी मुसलमानों को नुकसान होता है।"
स्वतन्त्रता के पश्चात् राष्ट्र के प्रति अनुराग पर गहरा प्रभाव पड़ा। भारत में निवासरत विभिन्न वर्ग-विभाजन के पश्चात् देश की भाँति ही टुकड़ों में विभक्त हो गया था। कुछ लोगों का राष्ट्र के प्रति लगाव उतनी ही गहराई से बना हुआ था तो कुछ लोगों ने नये राष्ट्र के प्रति आसक्ति दिखाई दे रही थी। देश प्रेम और टूटती आस्था उस समय की सबसे बड़ी समस्या के रूप में सामने आई थी। स्वाधीनता के पश्चात् के हिन्दी उपन्यासों में राष्ट्रीय भावना का विविध रूपों में प्रस्फुटन हुआ है। अधिकांशतः राष्ट्रीय चेतना का अनुकरण युवा मानस में अधिक है। राष्ट्र विकास, राष्ट्रीय सुरक्षा, पुनर्निर्माण, देशभक्ति आदि के रूप में राष्ट्रभक्ति की अवधारणाएं प्रवाहित हुई हैं।
जब हिन्दू-मुस्लिम दोस्ती के बीच खिंची लकीर
सन् 1947, भारत विभाजन के पश्चात् पूरा देश साम्प्रदायिकता की ज्वाला में झुलस रहा था। आज़ादी की सुबह नफरत, उदासी, दंगे साथ लेकर आई थी। बरसों से साथ रहे दोस्तों का दृष्टिकोण भी हिन्दू-मुस्लिम बन गया था, सम्बन्धों को मापने का आधार धर्म, सम्बन्ध जोड़ने का आधार धर्म पूर्णतः धर्म केन्द्रित मानसिकता को लेकर जी रहा था, स्वतंत्र भारत का समाज।
ऐसे विषम वातावरण में मित्रों के बीच भी एक लकीर खिंच गई थी और अपने भीतर हो रहे परिवर्तन का अनुभव कर मनुष्य स्वयं ही हैरान हुआ जा रहा था। 'टोपी शुक्ला' उपन्यास में इफ्फन और शुक्ला दो घनिष्ठ मित्रों के मन में विभाजन के पश्चात् जगा भाव उन्हें हैरान कर रहा था और अपने ही भीतर उठ रहे विचारों से सब शंकित थे। असुरक्षा के कारण पैदा हुआ डर इफ्फन को चौंका रहा था और धर्म के नाम पर भीतर जन्म लेने वाली नफरत से टोपी शुक्ला स्वयं झुंझला रहा था। इन दोनों पात्रों के भीतर पल रहे द्वन्द्व स्वाभाविक रूप से यथार्थ के धरातल पर अभिव्यक्त हुए हैं- "इफ्फन पहली बार अपने डर पर शक कर रहा था। और टोपी पहली बार अपनी नफरत पर झुंझला रहा था। दोस्ती झूठी है या डर? दोस्ती झूठी है या नफरत? ..."10 भीतर फैली आतंक भी अजीब-सा है। दोनों ही पक्ष इस आंतक से घिरे हैं। अजीब-सी नीरवता छा गई है। हर्ष और विषाद का मिला जुला ताण्डव आशा और निराशा की अनिश्चित धूप-छाँव, दूर तक फैला तिमिर और प्रकाश के आगमन की प्रतीक्षा कैसा था विभाजित भारत का नूतन आरम्भ "डर! यह डर दोनों तरफ हैं उदासी और गहरी हो गयी। अँधेरा और बढ़ गया। वह डर आखिर कहाँ-कहाँ है। इस डर से पिण्ड छूटने की कोई शाक है या नहीं...।" एक तरफ सम्प्रदायवाद दूसरी तरफ देश के साथ जुड़ा विश्वास सामने आ रहा था। भारत विभाजन के पश्चात् अपनों के बँट जाने के बाद तथा स्वधर्म पर आधारित देश होने की वजह से मुसलमानों में पाकिस्तान के प्रति लगाव ने उनकी देशभक्ति पर प्रश्नचिह्न लगा दिया था। 'टोपी शुक्ला' का ही हिन्दू पात्र एक तरफ मुसलमान लड़की से प्रेम करता है। दूसरी तरफ अपना दृष्टिकोण व्यक्त करता है कि "मुसलमान लड़की से इश्क कर रहा हूँ न इसीलिए जल रहे हो। तुम सब मुसलमान खाल के नीचे पाकिस्तानी हो।"
डर, नफरत और टूटते सामाजिक रिश्ते
धार्मिक संकीर्णताओं से अनभिज्ञ विकास पाता मस्तिष्क धर्म को लेकर उठ रहे विवादों से प्रभावित होते हुए सवाल कर उठता है कि "अब्बू क्या यह हिन्दू बहुत ख़राब होते हैं?" एक दिन उसने अपने अब्बू से पूछा। "और यह सिख तो बहुत ही ज़लील मालूम होते हैं।"
भारत विभाजन का निर्णय किसी एक सम्प्रदाय द्वारा लिया गया निर्णय नहीं था। विभाजन के पीछे एक तरफ अंग्रेज़ी शासन की भारत को कमजोर बनाने की साजिश शामिल थी, दूसरी ओर राजनीतिज्ञों की उच्च पद प्राप्त करने की स्वार्थपूर्ण संकीर्ण लालसा और इसका दुष्परिणाम भारत विभाजन के रूप में हमारे सामने आया, विभाजन की पीड़ा और उसके साथ जन्मी विनाशलीला को सामान्य जनता को भोगना पड़ा। भारतीय मुसलमानों की स्थिति अपने ही देश में अत्यन्त दयनीय हो गई थी। एक तरफ मुस्लिम राजनीतिज्ञों द्वारा पाकिस्तान की माँग ने भारतीय मुसलमानों की देशभक्ति पर प्रश्नचिह्न लगा दिया था दूसरी तरफ देश में फैली साम्प्रदायिकता की आग ने और स्वजनों के विछोह ने उन्हें विछिप्त कर दिया था। वैसे भी सामान्य भारतीय मुसलमान देश के बँटवारे के पक्ष में नहीं थे। पाकिस्तान इस्लामी मुल्क हैं इसलिये भारतीय मुसलमानों में उसके प्रति विशेष संवेदना तो है पर अपने देश के प्रति लगाव भी कम नहीं। 'टोपी शुक्ला' उपन्यास में राही मासूम रज़ा ने पाकिस्तान जाने के विरुद्ध वक्तव्य को तर्क के माध्यम से प्रस्तुत किया है- "नहीं! मैं पाकिस्तान कैसे जा सकता हूँ। मोहर्रम में इमाम हुसैन हिन्दुस्तान आते हैं। इस साल उनसे मुलाकात करके पूछेंगा कि सच बोलने की सज़ा आदमी को कब तक मिलती रहेगी।"
भारतीय समाज पहले से ही विभिन्न सम्प्रदाय जातियों में विभाजित है और धर्म के नाम पर भारतवासी विशेष रूप से संवेदनशील है। विशेषकर धर्म को लेकर दोनों के मध्य गहरी खाई है, किसी एक सम्प्रदाय की लड़की की प्रतिष्ठा और चुनौती बन जाती है। धर्म की प्रतिष्ठा को ध्यान में रखते हुए इस प्रकार के सम्बन्धों के लिए कोई अवकाश नहीं रखता है। वह धर्म एवं जाति की रक्षा के लिए अपनी सन्तान की बलि भी चढ़ा सकता है। 'टोपी शुक्ला' उपन्यास में राही ने धर्म की मर्यादा को लेकर परम्परावादी दृष्टि रखने वाले पात्र वाहिद के माध्यम से ऐसे ही व्यवहारिक सत्य को अभिव्यक्ति दी है।

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