पंकज धरोहर
भारत पर्यटन विकास निगम (आईटीडीसी), बिहार राज्य पर्यटन विकास निगम (बीएसटीडीसी) के द्वारा 1981 में रांची अशोक बिहार होटल कॉर्पोरेशन (आरएबीएचसी) का गठन कर होटल रांची अशोक के निर्माण का निर्णय लिया गया था। तत्कालीन बिहार सरकार के द्वारा पर्यटन के विकास हेतू डोरंडा में रांची अशोक बिहार होटल कॉर्पोरेशन को 2.69 एकड़ जमीन 99 साल की लीज पर दिया गया था। संयुक्त उपक्रम के रूप में इस होटल का संचालन 1988 में शुरू हुआ। उस वक्त यह होटल झारखंड का सर्वश्रेष्ठ होटल हुआ करता था। शुरू में ऐसे हालात थे कि लोग मंदिरों में भगवान के दर्शन के साथ-साथ इस होटल को भी अंदर से देखने के लिए व्याकुल रहते थे।
इस होटल में दो सभागार थे एक नालंदा और दूसरा वैशाली। एक मनमोहन रेस्टोरेंट हुआ करता था जिसका नाम मिथिला था जो मिथिला की संस्कृतियों, कलाकृतियों का लोगों को एहसास देता था। इसमें एक आधुनिक बार भी था जो चित्रलेखा बार के नाम से बहुत प्रसिद्ध था। इस होटल को सौ कमरों का बनाने की योजना थी जिसके प्रथम चरण में तीस कमरों का निर्माण किया गया था लेकिन बांकी अन्य कमरों का निर्माण सिर्फ फाईलों में ही सिमट कर रह गया। जिसके लिए न बिहार सरकार की तरफ से कोई सकारात्मक पहल की गई और ना ही भारत पर्यटन विकास निगम और कमरों के निर्माण के लिए उत्सुक दिखी जबकि होटल का यह हाल था कि अतिथियों को कमरे नहीं मिलते थे और जिन्हें कमरे मिल जाते थे वे खुद को भाग्यशाली समझते थे।
मिथिला रेस्टोरेंट का यह हाल था कि लोग खाने के लिए नंबर लगाकर लॉबी में अपने नंबर का इंतजार करते थे। यहां का तंदूरी और कांटिनेंटल व्यंजन के स्तर का भोजन आज भी रांची के किसी होटल में नहीं मिलता है। यहां का बेगम-ए-समुंदर और कड़ाही मुर्ग का स्वाद आज तक रांची के किसी होटल में देखने को नहीं मिला। एक वक्त ऐसा आया कि होटल रांची अशोक का शुमार भारत पर्यटन विकास निगम के टॉप होटलों में होने लगा था।

सुबोधकांत सहाय जब केंद्रीय पर्यटन राज्य मंत्री बने तो उन्होंने अपने कोष से होटल के परिसर में अशोक कन्वेंशन सेंटर बनाने का निर्णय लिया। यह कन्वेंशन सेंटर ऐसा बना जैसा बहुत कम ही देखने को मिलता है। पांच हजार लोगों की स्टैंडिंग कैपेसिटी और दो हजार लोगों की सिटिंग कैपेसिटी इस सेंटर की सबसे अलग पहचान बना रहे थे लेकिन इस कन्वेंशन सेंटर के निर्माण के पूर्व ही कर्मचारियों के भविष्य के साथ खेल शुरू हो चुका था। इस होटल का संचालन खुद के कमाए पैसे से ही हुआ करता था लेकिन होटल का राहू काल शुरू हो चुका था। आईटीडीसी पूर्व में अनुभवी लोगों को यहां जीएम के पद पर कार्य हेतू भेजती थी लेकिन अचानक नये-नये, अनुभवहीन लोगों को जीएम के पद पर भेजा जाने लगा जो होटल के पतन का, बंद होने का कारण बना। आईटीडीसी में एप्रेंटिस के रूप में सीख रहे लोगों को यहां सहायक प्रबंधक बनाकर भेजा जाने लगा। होटल में रिपेयरिंग का कार्य लगभग बंद सा हो गया था जिससे होटल की स्थिति दिन व दिन बदतर होती चली गई।
कर्मचारियों के लिए यहां कोई प्रमोशन पॉलिसी नहीं बनाया गया। जो जिस पद पर ज्वाइन किए उसी पद पर रिटायर कर रहा था। अन्य जगहों पर लोग सातवें वेतनमान के अनुरूप वेतन ले रहे थे लेकिन इस होटल के कर्मचारियों को पांचवें वेतनमान के अनुरूप निम्न स्तर का वेतन दिया जा रहा था जो कर्मचारियों में कार्य के प्रति अरुचि पैदा कर रहा था जबकि आईटीडीसी के द्वारा भेजे गए प्रबंधक गण को छठे-सातवें समस्त वेतनमान का लाभ दिया जा रहा था।
जिस जमीन पर अशोक कन्वेंशन सेंटर का निर्माण किया गया उस लॉन का नाम राजा लॉन था जो होटल में विभिन्न पार्टियों के द्वारा कमाई का मुख्य स्त्रोत था जिसे कन्वेंशन सेंटर के निर्माण के लिए बंद कर दिया गया। होटल के आय का मुख्य स्त्रोत अचानक बंद हो गया। कुछ ही दिनों में वेतन की समस्या शुरू होने लगी।
आईटीडीसी की तरफ से आए युवा महाप्रबंधक होटल के विकास से ज्यादा वॉलीबॉल और क्रिकेट खेलने में रूचि दिखाते थे। जिसके लिए वे होटल को ट्रेनी पर छोड़ कर्मचारियों को अपने साथ राजा लॉन में ले जाकर वॉलीबॉल खेलते थे क्योंकि सभी अंदर से अवगत थे कि होटल को बंद करना है।
इसी बीच डोरंडा भारतीय स्टेट बैंक, गेल और इंडियन एयरलाइंस की तरफ से नये-नये प्रस्ताव आए। अगर उपरोक्त प्रस्ताव मान लिया जाता तो कर्मचारियों को वेतन, अन्य खर्च के बाद भी करोड़ों रुपये बचते लेकिन आईटीडीसी मन ही मन इसे बचने का निर्णय ले चुकी थी इसलिए उनमें होटल के बेहतर संचालन की कोई रूचि नहीं बची थी और अचानक मार्च 2018 में होटल को बंद कर दिया गया।
इसमें आईटीडीसी का 51 फीसदी शेयर था और बीएसटीडीसी का 49 फीसदी। झारखंड बनने के बाद बिहार का 49 फीसदी शेयर से 12.25 शेयर झारखंड को दिया गया जबकि यह कानून है कि "एज इज वेयर इज"मतलब बंटवारे के बाद जो संपत्ति जिस राज्य में है वह उसी का होगा ।

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