डॉ शाहनवाज कुरैशी
आज खेल दिवस है। खेल दिवस पर हॉकी की चर्चा स्वाभाविक है। झारखंड में जयपाल सिंह मुंडा से लेकर सिलबानुस डुंगडुंग तक का एक सुनहरा अध्याय है। नोएल टोप्पो, माइकल किंडो, मनोहर टोपनो, अजीत लकड़ा जैसे खिलाड़ियों ने हॉकी को नई ऊचाइयों तक पहुंचाया, लेकिन राष्ट्रीय स्तर महिला हॉकी में झारखंड की एक अलग धमक है। वास्तव में "रूर ऑफ इंडिया" के उपनाम से मशहूर झारखंड की रत्नगर्भा भूमि खनिजों के साथ खेल प्रतिभाओं के लिए विख्यात है। आदिवासी समाज अत्यंत जीवंत है। कहावत है "सेनगे सुसुन, काजिगे दुरंग" यानी जहां चलना ही नृत्य और बोलना गीत-संगीत है। जनजातीय बहुल झारखंड राज्य में हॉकी को लेकर एक जुनून दिखायी देता है। सुदूर ग्रामीण इलाकों में आयोजित खस्सी टूर्नामेंट में भी हज़ारों की भीड़ उमड़ पड़ती है। झारखंड महिला एशियन चैंपियन ट्रॉफी (2023) में सात हजार की क्षमता वाले स्टेडियम में 12 हज़ार लोग मौजूद थे, तो स्टेडियम के बाहर 20 हज़ार दर्शकों का हुजूम स्टेडियम से बाहर लगे बड़े स्क्रीन पर मैच का लुत्फ उठाने मौजूद था। जनवरी 2024 में एचआईएफ ओलंपिक क्वालीफायर में भी यही नज़ारा था।
क्यों है झारखंड में महिला हॉकी का जुनून
झारखंड भारत का वह राज्य है जहां महिला हॉकी को एक अलग पहचान और सम्मान मिला है। हॉकी आदिवासी समाज की संस्कृति से जुड़ा हुआ है। महिला हॉकी के प्रति जुनून के लिए कई तथ्य महत्वपूर्ण है।
ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि झारखंड की: जनजातीय संस्कृति में खेलों का हमेशा से महत्वपूर्ण स्थान रहा है। यहां की जनजातियों के पारंपरिक खेलों में टीम भावना और प्रतिस्पर्धा की झलक देखने को मिलती है। हॉकी यहां की संस्कृति से गहरे रूप से जुड़ा है। यहां की महिलाएं शारीरिक गतिविधियों और खेलों में सदैव सक्रिय रही हैं।
महिला हॉकी में झारखंड का योगदान
1980 के दशक से अब तक झारखंड की 70-80 खिलाड़ियों ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी चमक बिखेरी। ये खिलाड़ी अपने ग्रामीण इलाके में लोगों के लिए रोल मॉडल बन जाती हैं। सावित्री पूर्ति, विश्वासी पूर्ति, दयामनी सोया, अलमा गुड़िया, हेलेन सोय, सुमराय टेटे, असुंता लकड़ा, पुष्पा प्रधान, मसीरा सुरीन, एडलिन केरकेट्टा, निक्की प्रधान और सलीमा टेटे जैसे खिलाड़ियों की सफलता उनके लिए उत्कृष्ट उदाहरण है।
प्राकृतिक और भौगोलिक परिस्थितियां
झारखंड की भौगोलिक परिस्थितियां हॉकी खेलने के लिए आदर्श हैं. राज्य में खुले मैदानों और प्राकृतिक स्थलों की भरमार है, जो हॉकी जैसे खेलों के लिए अनुकूल हैं। यहां की महिलाओं में मेहनत और जुझारूपन की भावना बचपन से ही देखी जाती है, जो उन्हें हॉकी जैसे खेल के लिए उपयुक्त बनाती है।
सरकार का योगदान
झारखंड में हॉकी के प्रति लोगों की दीवानगी को बढ़ावा देने में राज्य सरकार का महत्वपूर्ण योगदान है। सिमडेगा, रांची, और खूंटी जैसे जिलों में हॉकी अकादमियां स्थापित की गई हैं। खिलाड़ियों को स्कॉलरशिप, रोजगार, और प्रशिक्षण के लिए आर्थिक सहायता दी जाती है। अंतरराष्ट्रीय मानकों के हॉकी स्टेडियम के निर्माण से हॉकी को बढ़ावा मिल रहा।
जनजातीय समाज और महिलाओं की भूमिका
झारखंड का जनजातीय समाज महिलाओं को स्वतंत्रता और निर्णय लेने का अधिकार देता है।जनजातीय समाज में महिलाओं को पुरुषों के समान दर्जा प्राप्त है। ग्रामीण क्षेत्रों की महिलाएं बाल्यावस्था से ही खेलों में भाग लेना शुरू कर देती हैं जिसकारण उनकी नैसर्गिक प्रतिभा उभर कर सामने आती है।
स्थानीय खिलाड़ियों से जुड़ाव
हॉकी के प्रति दीवानगी का बड़ा कारण स्थानीय खिलाड़ियों से जुड़ाव भी है। दर्शकों को अपने स्थानीय खिलाड़ियों पर गर्व होता है और उसकी हौसलाअफजाई के लिए वे स्टेडियम में बड़ी संख्या में जुटते हैं। हॉकी मैच देखना झारखंड के ग्रामीण और शहरी दर्शकों के लिए सस्ता और सुलभ मनोरंजन है। हॉकी मैच यहां के लोगों के लिए किसी त्योहार से कम नहीं होता।
महिला हॉकी का सामाजिक प्रभाव
पिछले एक दशक से महिला हॉकी 70 से अधिक खिलाड़ियों को सरकारी नौकरी मिली। झारखंड की महिला हॉकी खिलाड़ियों की यह सफलता अन्य महिलाओं को भी प्रेरित करती है। झारखंड के और आदिवासी खिलाड़ी राष्ट्रीय फलक पर अपनी चमक और बिखेरने का माद्दा रखते हैं। हॉकी ने झारखंड में महिला सशक्तिकरण को एक नई दिशा दी है और दर्शकों के लिए गर्व और उत्साह का कारण बन गया है। गांव एवं ब्लॉक स्तर पर प्रोत्साहन, पंचायत व जिला स्तर पर अच्छे कोच, खुराक व आधुनिक प्रशिक्षण मिले, तो झारखंड खेलों का हब बन सकता है। हकीकत में झारखंड महिला हॉकी की नर्सरी से महिला हॉकी का ‘मक्का’ बनने की ओर अग्रसर है। बस जरूरत इंफ्रांस्ट्रक्चर का विकास। ओड़िशा इस संदर्भ में एक उत्कृष्ट उदाहरण बन सकता है।

Comments (0)
Write first comment
Please Login to write comment