डा. नीतीश प्रियदर्शी भूवैज्ञानिक एवं पर्यावरणविद
आज ग्लोबल वार्मिंग पूरी दुनिया के सामने एक गंभीर पर्यावरणीय चुनौती बनकर खड़ी है। बढ़ता औसत तापमान, अनियमित वर्षा, सूखा, जंगलों में बदलाव, नदियों के व्यवहार में परिवर्तन और चरम मौसमी घटनाएं हमें लगातार यह एहसास करा रही है कि पृथ्वी की जलवायु स्थिर नहीं है। लेकिन क्या पृथ्वी पहली बार गर्म हो रही है? वैज्ञानिक दृष्टि से इसका उत्तर है-नहीं।
पृथ्वी के लगभग 4.6 अरब वर्षों के इतिहास में जलवायु में अनेक बार बड़े परिवर्तन हुए हैं। पृथ्वी ने अत्यधिक गर्म दौर भी देखे हैं और ऐसे समय भी देखे हैं जब उसका बड़ा हिस्सा बर्फ से ढक गया था। कभी समुद्रों का विस्तार हुआ, कभी विशाल भूभागों पर घने जंगल विकसित हुए और कभी तापमान तथा वर्षा में हुए बदलावों ने जीव-जगत और मानव समाज को प्रभावित किया। इन प्राचीन जलवायु परिवर्तनों की जानकारी हमें चट्टानों, जीवाश्मों, हिम-परतों, समुद्री अवसादों और भू-रासायनिक संकेतों से मिलती है। लेकिन इसके अलावा एक और महत्वपूर्ण स्रोत है-मानव की स्मृति। झारखंड की अनेक जनजातीय परंपराओं में ऐसी लोककथाएं और मौखिक कथाएं मिलती हैं जिनमें अत्यधिक गर्मी, पानी के स्रोतों के सूखने, जंगलों और जीव-जंतुओं में बदलाव तथा प्रकृति में बड़े परिवर्तन की स्मृतियाँ दिखाई देती हैं। इन कथाओं को यदि केवल धार्मिक या काल्पनिक कहानी मानकर छोड़ दिया जाए तो हम उनके भीतर छिपी संभावित पर्यावरणीय स्मृति को समझने का अवसर खो सकते हैं।
हाल के वर्षों में भविष्य के वैश्विक पर्यावरण की स्थिति मनुष्य के लिए चिंता का विषय बनी हुई है। वर्तमान पर्यावरणीय परिवर्तन, जैसे वैश्विक तापन, मानव अस्तित्व और उसके पर्यावरण के लिए गंभीर खतरा पैदा कर रहे हैं। आज मनुष्य यह समझने का प्रयास कर रहा है कि आने वाले सौ वर्षों में इन पर्यावरणीय परिवर्तनों का स्वरूप और उनकी तीव्रता कैसी होगी। क्या वैश्विक गर्मी कोई हाल की घटना है? नहीं, ऐसा नहीं है। हमारा ग्रह पृथ्वी अपने भूवैज्ञानिक इतिहास में कई बार ऊष्मीय या गर्म जलवायु के दौर से गुजर चुका है। इसके प्रमाण विभिन्न भूवैज्ञानिक साक्ष्यों से मिलते हैं। पृथ्वी की जलवायु का इतिहास निरंतर परिवर्तन से भरा हुआ है।
पृथ्वी पर हिमाच्छादन के काल के बाद गर्म जलवायु के अंतराल आते रहे हैं और इन ठंडे तथा गर्म कालखंडों की अवधि में भी बहुत अधिक अंतर रहा है। वैज्ञानिक प्रमाणों के अलावा, भारत के झारखंड राज्य की कुछ जनजातियों की लोककथाओं में भी प्राचीन काल में अत्यधिक गर्मी और उससे उत्पन्न विनाश का उल्लेख मिलता है। इन कथाओं के अनुसार अत्यधिक गर्मी या अग्निवृष्टि के कारण प्राचीन समय में बड़ी संख्या में लोगों की मृत्यु हुई थी। यह घटना लाखों वर्ष पुरानी नहीं मानी जाती, बल्कि संभव है कि इसका संबंध आज से लगभग 8,000 से 10,000 वर्ष पूर्व के किसी प्राचीन पर्यावरणीय परिवर्तन से हो। हालांकि इन जनजातियों के पास उस समय वैज्ञानिक तथ्यों को प्रस्तुत करने का कोई तरीका नहीं था। इसलिए उन्होंने संभवतः अत्यधिक गर्मी या किसी बड़े प्राकृतिक विनाश को आकाश से होने वाली अग्निवृष्टि के रूप में व्यक्त किया—एक ऐसी अग्निवृष्टि, जिसे ईश्वर ने दुष्ट लोगों को नष्ट करने के लिए पृथ्वी पर बरसाया।
मुंडा जनजाति की लोककथा
मुंडा, भारत की प्राचीन जनजातियों में से एक हैं। उनके अनुसार मुंडाओं की सृष्टि सिंगबोंगा ने की थी, जिन्हें सूर्य देवता अथवा सर्वोच्च देवता माना जाता है। मुंडा जनजाति की प्राचीन ऊष्मीकरण से संबंधित एक लोककथा इस प्रकार है:—“मानव इतिहास के आरंभ से भी बहुत पहले की बात है। उस समय पृथ्वी अभी अपने शैशवकाल में थी। सिंगबोंगा-‘समय के भयानक स्वामी’-सोने के सिंहासन पर विराजमान थे और अपनी दिव्य संगिनी के साथ आनंदपूर्वक वार्तालाप कर रहे थे। लेकिन स्वर्ग का यह आनंद अधिक समय तक नहीं रहा। अचानक वातावरण में असहनीय गर्मी भर गई। इसी समय पृथ्वी पर विचरण करने वाले पशुओं की करुण पुकार सिंगबोंगा के स्वर्गीय सिंहासन तक पहुंची। उन्होंने शिकायत की कि असुर जनजाति की लोहे को गलाने वाली भट्ठियों से निकलने वाली भयंकर गर्मी ने पृथ्वी के झरनों, तालाबों और जलाशयों को सुखा दिया है तथा सारी वनस्पतियों को झुलसा दिया है। हम भूख और प्यास से मर रहे हैं। न तो आकाश में उड़ने वाले पक्षियों को भोजन मिल रहा है और न ही धरती पर रेंगने वाले जीवों को खाने और पीने के लिए कुछ बचा है।”
ऐतिहासिक और मानवशास्त्रीय अध्ययनों के अनुसार, प्राचीन काल में असुर जनजाति लौह-धातुकर्म के लिए प्रसिद्ध थी। वे लौह-अयस्क से लोहे को निकालने और चट्टानों में मौजूद लौह को पिघलाने के लिए पारंपरिक भट्टियों का उपयोग करते थे तथा उनसे हथियार और अन्य लौह वस्तुएं बनाते थे। मुंडा लोककथा में भट्ठियों से उत्पन्न अत्यधिक गर्मी को नदियों, तालाबों और वनस्पतियों के सूखने तथा जीव-जंतुओं के संकट का कारण बताया गया है। आधुनिक दृष्टि से देखें तो यह कथा अत्यधिक गर्मी, सूखे और पर्यावरणीय संकट की एक सांस्कृतिक स्मृति के रूप में भी देखी जा सकती है।
अग्निवृष्टि की लोककथा
एक अन्य लोकप्रिय मुंडा कथा में कहा गया है: “मनुष्यों ने सिंग बोंगा के प्रति अपनी निष्ठा त्याग दी। तब सिंगबोंगा ने अपने सेवकों—पक्षी ‘कौआ भंडारी’ (कौआ, भंडारी) और ‘लिपि सुसारी’ (लिपि, रसोइया)—के माध्यम से पृथ्वी पर रहने वाले मनुष्यों को चेतावनी भेजी। लेकिन मनुष्यों ने सिंग बोंगा की आज्ञा मानने से इनकार कर दिया। मनुष्यों की इस अवज्ञा से क्रोधित होकर सिंग बोंगा ने पृथ्वी पर भयंकर अग्निवृष्टि कर दी, जिससे मानव जाति का विनाश हो गया।” इस कथा में वर्णित ‘अग्निवृष्टि’ को आधुनिक दृष्टिकोण से अत्यधिक गर्मी, भीषण सूखे अथवा किसी बड़े पर्यावरणीय संकट के प्रतीक के रूप में देखा जा सकता है। हालांकि इसे सीधे तौर पर आधुनिक अर्थों में ‘ग्लोबल वार्मिंग’ का वैज्ञानिक प्रमाण नहीं माना जा सकता।
मारंडी जनजाति की कथा
एक अन्य लोककथा के अनुसार, जब विभिन्न जनजातियों के बीच सामाजिक विभाजन और उनके स्थान निर्धारित किए जा रहे थे, तब मारंडी समुदाय की उपेक्षा कर दी गई। इससे उस समुदाय के दो सदस्य—अंबीर सिंह और बीर सिंह, जो माउंट हेरे नामक स्थान से संबंधित बताए जाते हैं—क्रोधित हो गए। उन्होंने अन्य जनजातियों को नष्ट करने के लिए स्वर्ग से अग्नि की प्रार्थना की। इसके बाद आकाश से अग्नि बरसी और पूरा क्षेत्र तबाह हो गया। इस विनाश में लगभग आधी आबादी नष्ट हो गई। किंवदंती के अनुसार अंबीर सिंह और बीर सिंह का घर पत्थर का बना हुआ था, इसलिए वे इस अग्निविनाश से सुरक्षित बच गए।
संताल जनजाति की कथा
बंगाल और झारखंड की संताल जनजाति में भी एक समान लोककथा मिलती है। कथा के अनुसार, जब पिलचू हड़ाम और पिलचू बूढ़ी, जिन्हें प्रथम पुरुष और प्रथम महिला माना जाता है, किशोरावस्था में पहुंचे, तब सात दिनों तक अग्निवृष्टि हुई। सात दिनों तक हुई इस अग्निवृष्टि ने पृथ्वी पर भयंकर विनाश किया।
हो जनजाति की कथा
झारखंड की हो जनजाति में भी मानव जाति के विनाश से संबंधित एक मिथक मिलता है। इस कथा के अनुसार, प्रारंभिक मनुष्य अनैतिक जीवन जीने लगे थे और उन्होंने ईश्वर की आवश्यकता को ही भुला दिया था। तब सृष्टिकर्ता सिरमा ठाकुर अथवा सिंग बोंगा ने मनुष्यों को दंड देने के लिए उन्हें अग्नि द्वारा नष्ट कर दिया।
लोककथाओं में जलवायु परिवर्तन की स्मृति
भारत की विभिन्न प्राचीन जनजातियों के इतिहास और लोककथाओं में इस प्रकार के अनेक उदाहरण मिलते हैं, जिनमें अत्यधिक गर्मी, अग्निवृष्टि, सूखा, पर्यावरणीय विनाश और मानव जाति के संकट का वर्णन किया गया है। इन कथाओं को आधुनिक विज्ञान की कसौटी पर सीधे-सीधे प्राचीन वैश्विक तापन का प्रमाण नहीं कहा जा सकता। फिर भी, यह विचार महत्वपूर्ण है कि हजारों वर्षों से मौखिक परंपराओं के माध्यम से किसी बड़े प्राकृतिक या जलवायु परिवर्तन की स्मृति पीढ़ी-दर-पीढ़ी संरक्षित हो सकती है। आज जब पूरी दुनिया जलवायु परिवर्तन और वैश्विक तापन की समस्या से जूझ रही है, तब झारखंड की जनजातीय लोककथाएं हमें यह सोचने के लिए प्रेरित करती हैं कि मानव समाज ने अतीत में भी जलवायु और पर्यावरणीय संकटों का सामना किया होगा और उन घटनाओं को अपनी सांस्कृतिक स्मृतियों, मिथकों और लोककथाओं में सुरक्षित रखा होगा। इस दृष्टि से झारखंड की जनजातीय लोककथाएं केवल धार्मिक या पौराणिक कथाएं नहीं हैं; वे मानव, प्रकृति और जलवायु के बीच प्राचीन संबंधों की सांस्कृतिक स्मृतियों के रूप में भी महत्वपूर्ण हो सकती हैं

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