कुंदन कुमार चौधरी
पिछले सालों में देखेंगे तो हिंदी में बनी व डब हुई सबसे सफल फिल्मों में ‘धुरंधर 1-2’, ‘पुष्पा 1-2’, ‘जवान’, ‘स्त्री-2’, ‘पठान’, ‘एनिमल’, ‘केजीएफ 1-2’, ‘आरआरआर’, ‘छावा’, ‘कल्कि 2898 एडी’ हैं। सारी फिल्में लार्जर दैन लाइफ और माड़-धाड़, शोर-शराबे से भरी। ये सारी फिल्में बिग बजट थीं। लागत व उसकी कमाई अगर देखें तो इन सबसे बहुत आगे ‘हनुमान अंश’ आती है जिसे हम ‘स्लीपर ब्लॉक बस्टर’ कह सकते हैं, जिसने मात्र डेढ़ करोड़ की लागत में बड़ी-बड़ी फिल्मों के सामने नया कीर्तिमान बनाया। इस हफ्ते तक डेढ़ सौ करोड़ कमा लेगी। सवाल उठता है कि आखिर इस फिल्म में ऐसी क्या बात है कि इसने सारे फिल्मी बॉक्स ऑफिस पंडितों की बोलती बंद कर दी। जैसा विज्ञान कहता है और मेरा भी मानना है कि हर चीज का एक सेचुरेशन प्वॉइंट होता है। एक जैसी फिल्में देख अघाये दर्शक अब फिर से पुराने दौर की हिंदी फिल्मों की विरासत को फिर से जीना चाह रहे हैं। जैसे, ‘गेहूं की रोटी’ खाकर अघाए लोग अब फिर से मड़ुआ, मकई, कोदो, ज्वार, बाजरा, सावा, गोंदली की ओर रुख कर रहे हैं। ऐसा नहीं है कि गेहूं की रोटी खत्म हो जाएगी, लेकिन अब लोग मोटे अनाज की अहमियत समझने लगे हैं। उसी तरह, कमर्शियल फिल्में कभी बंद नहीं होंगी, लेकिन अब ‘हनुमान अंश’ जैसी फिल्मों के दर्शक भी मिलने लगेंगे। ऐसी फिल्में बनने लगेंगी।
आज के बहुत कम दर्शक वी. शांताराम, विमल रॉय की फिल्में देखी होंगी। इनकी फिल्में सामाजिक सुधार, नैतिकता व मानवीय मूल्यों पर आधारित होती थीं, लेकिन मनोरंजन की कमी नहीं होती थी। ‘हनुमान अंश’ की खासियत उसकी सहज कहानी और सरल ढंग से फिल्माने का ढंग है। मैंने इस रविवार को यह फिल्म देखी और हाउसफुल हॉल में जेन-जी से ज्यादा जेन-एल्फा बड़ी संख्या में दिखे, जो फिल्म को खूब एंज्वॉय भी कर रहे थे। सभी अपने पेरेंट्स व ग्रैंड पेरेंट्स के साथ आए थे। इस जेनरेशन का इस तरह की फिल्मों में झुकाव का कारण आधी फिल्म में लक्ष्मी नारायण (नीम करोरी बाबा) को सात वर्ष से 13 वर्ष की उम्र का दिखाया जाना भी है। मैं इसे ‘धार्मिक फिल्म’ फिल्म नहीं मानता। क्योंकि आम धार्मिक फिल्म जैसा इसका ट्रीटमेंट नहीं है। कहीं भाषण नहीं। बाबा का महिमामंडन करने की जबरदस्ती कोशिश नहीं की गई है। हां, चमत्कार दिखाए गए हैं। घटनाओं को ऐसे पिरोया गया है कि आप बस झरने की धार की तरह फिल्म में शुरू से अंत तक बस बहते चले जाते हैं। गांव, घर, गांव के बच्चे, उस समय के लोग, पहनावा, खान-पान और एक्सप्रेशन ऐसा है, जैसे हम 40 या 50 के दशक की फिल्मों में देखते थे। कहीं मेलोड्रामा नहीं। सरल, सात्विक... दिल को छूने वाली।
फिल्म का सबसे सुखद पहलू इसके गीत-संगीत है। फिल्म में दर्जनभर (11) भजन हैं, लेकिन ये टिपिकल भजनों की तरह नहीं लगते। एकदम निर्मल दिल को छूने वाले धुन व निश्छल आवाजें कब कान से होते हुए दिल को छू लेते हैं, पता ही नहीं चलता। मेरा फेवरेट ‘पार्वती’ है। इसके गीत पढि़ए- ‘जब जिद पे आ गई पार्वती, पार्वती, पार्वती...समझाने पहुंचे सप्त ऋषि, सप्त ऋषि, सप्त ऋषि...काहे जिद कर रही, काहे घुमर रही, ऐसे वर के लाने काहे जिद कर रही...’ अवधी मिश्रित हिंदी का इतना खूबसूरत प्रयोग कम ही सुनने को मिलता है। असल में अवधी बोली ही इतनी खूबसूरत है और इसकी सादगी ऐसी है कि आज नहीं 16वीं शताब्दी में भी अवधी में लिखी ‘रामचरित मानस’ ने पूरे देश को एक सूत्र में पिरो दिया था। ‘मैंने तेरे ही भरोसे...’ में सुनील लोधी की आवाज अनोखी व सुमधुर है। ‘हे खरारी’ सुनकर मुझे ऐसा लगा, जैसे ऐसी धुन पहली बार सुनी हो। ‘आवागमन’, ‘सासा हाले’ और ‘बजरंग बांका’ जैसे गाने फिल्म के आध्यात्मिक माहौल को और मजबूत करते नजर आते हैं। वहीं ‘राम भजन की ओर’, ‘जय हनुमान’, ‘सियावर रामचंद्र की जय’, ‘वैष्णव जन तो’ और ‘हृदय में जिनके सियाराम’ जैसे गाने फिल्म की गति को बढ़ाते हैं, रोचक बनाते हैं।
‘हनुमान अंश’के डायरेक्टर डॉ. विशाल चतुर्वेदी की चर्चा करना सबसे जरूरी है। उन्होंने इस फिल्म को लिखा भी है। आध्यात्मिक गुरु नीम करौरी बाबा के जीवन के एक भाग तो इतनी सहजता से पर्दे पर उतारना आसान नहीं। मुझे फिल्म दो तरह की लगी। पहला आधा घंटा फिल्म में कई कमी दिखती है, कैमरा हिलता-डुलता रहता है। कलाकारों का परफॉर्मेंस भी ढंग से निकल कर डायरेक्टर नहीं ला पाते। लेकिन, जैसे-जैसे फिल्म आगे बढ़ती है, डायरेक्टर की पकड़ मजबूत होती जाती है। फिर तो डॉ. विशाल ऐसा चक्रव्यूह रचते हैं कि आप दो सवा दो घंटे कहानी में डूबते-उतराते रहते हैं। फ़िल्म की सबसे बड़ी खासियत इसका कॉमेडी स्टाइल ट्रीटमेंट है। बाबा के सारे चमत्कार ऐसे दिखाए गए हैं कि देखकर मजा आता है, जैसे रेल लाइन में तरबूज चोर का पैर फंसना, सांप से पार्वती के पति का डरना, अंग्रेज अफसर द्वारा बाबा को ट्रेन से उतारना, जेल के अंदर-बाहर बाबा का लघुशंका के लिए आना-जाना, बाल बाबा का गांव के बच्चों संग इंटरेक्शन। वहीं कई ऐसे सीन भी हैं जो रोंगटे खड़े करते हैं, खासकर जंगल में भूत व हनुमान चालीसा का पाठ, गुफा में बाबाजी के चारों ओर लिपटे सांप। कुछ दृश्य दिल को लुभाते हैं, जैसे चिड़ियों व चींटियों से बाबा की बातचीत, कढ़ी-चावल खाने का दृश्य आदि।
ऐसा ही इसके एक्टर्स के बारे में कह सकते हैं। नीम करौरी बाबा बने शोभिनव सत्या शुरू में थोड़े असहज दिखते हैं, लेकिन धीरे-धीरे वह परिपक्व अभिनेता की तरह फिल्म में रम जाते हैं। उनकी मुस्कान व बोलतीं आंखें दिल जीत लेती है। बालक बने बाबा की भूमिका में विहान शेडगे ने गजब का काम किया है। उनकी एक्टिंग व हाव-भाव कमाल के हैं। कहीं भी कुछ कमी नहीं निकाल सकते। बाबा की पत्नी रामबेटी बनीं पूर्णिमा तिवारी, डॉ. राम नंदन भोसंले बने चंदन आनंद और बाकी कलाकार भी उम्दा हैं। सपोर्टिंग कास्ट ने बेहतरीन काम किया है। गोपाल दास बहेलिया बने भगवान दास पटेल का उल्लेख करना जरूरी है। उन्होंने बेहतरीन काम किया है। फ़िल्म ऐसी है कि अगले भाग की प्रतीक्षा अभी से हो रही। हर उम्र के लोगों को फ़िल्म पसंद आएगी। जरूर देखें।
-कुंदन कुमार चौधरी, झारखंड के वरिष्ठ पत्रकार हैं। फिलहाल दैनिक भास्कर, रांची से जुड़े हैं। झारखंड बेस्ड स्पेशल स्टोरीज के लिए जाने जाते हैं। 26 वर्षों से पत्रकारिता कर रहे हैं।
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