‘हनुमान अंश’: श्रद्धा, साधना और समर्पण को पर्दे पर उतारने की कोशिश
नीम करौली बाबा के जीवन और आध्यात्मिक यात्रा पर बनी ‘हनुमान अंश’ चमत्कारों से आगे बढ़कर सेवा, करुणा, भक्ति और आत्मसमर्पण को केंद्र में रखती है। फिल्म में बाबा और उनकी पत्नी रामबेटी के संबंध से लेकर उनके आध्यात्मिक जीवन तक को मानवीय दृष्टि से देखने की कोशिश की गई है। कम बजट से शुरू हुई फिल्म की ₹100 करोड़ से अधिक की बॉक्स ऑफिस यात्रा भी इसे खास बनाती है।
फिल्म समाप्त होने के बाद कुछ देर तक मैं अपनी सीट पर ही बैठा रहा। पर्दे पर कहानी समाप्त हो चुकी थी, लेकिन भीतर एक भाव लगातार बना हुआ था “कला केवल अभिव्यक्ति नहीं है, कला समर्पण मांगती है।” नीम करौली बाबा जैसे व्यक्तित्व पर फिल्म बनाना अपने आप में एक कठिन सिनेमाई चुनौती है। किसी संत, साधक या आध्यात्मिक व्यक्तित्व के जीवन को पर्दे पर प्रस्तुत करना केवल घटनाओं को क्रमबद्ध कर देना नहीं होता। चुनौती इससे कहीं बड़ी है उस अनुभूति को दृश्य भाषा देना, जिसने किसी व्यक्ति को उसके समय से आगे जाकर लोक-स्मृति और आस्था का हिस्सा बना दिया।विशाल चतुर्वेदी की ‘हनुमानअंश’ को इसी संदर्भ में देखना अधिक सार्थक लगता है।
फिल्म का आरंभ बाबा के जीवन और उनके भीतर चलने वाले उस आध्यात्मिक द्वंद्व से होता है, जिसमें एक ओर गृहस्थ जीवन है और दूसरी ओर साधना की ओर लगातार बढ़ता हुआ मन। यही वह बिंदु है जहां फिल्म नीम करौली बाबा को केवल एक चमत्कारी संत के रूप में प्रस्तुत करने के बजाय उनके भीतर के मनुष्य तक पहुंचने का प्रयास करती है।
फिल्म का सबसे संवेदनशील पक्ष बाबा और उनकी पत्नी रामबेटी के संबंध का चित्रण है। रामबेटी के साथ बाबा का संबंध फिल्म में केवल वैवाहिक संबंध नहीं है यह उस मनुष्य की कहानी है जो धीरे-धीरे सांसारिक जीवन से विरक्ति की ओर बढ़ रहा है, जबकि उसके पीछे एक पत्नी, एक परिवार और अनेक मानवीय अपेक्षाएं छूट रही हैं।
नीम करौली बाबा
रामबेटी का प्रेम, उनकी प्रतीक्षा और बाबा के आध्यात्मिक मार्ग के प्रति उनका धीरे-धीरे स्वीकार का भाव फिल्म को एक आवश्यक मानवीय धरातल प्रदान करता है। विशेष रूप से उनका बाबा से दाढ़ी बनवाने का आग्रह और बाबा का उस छोटी-सी इच्छा को स्वीकार करना यह दृश्य किसी बड़े चमत्कार की तुलना में कहीं अधिक मानवीय प्रभाव पैदा करता है। क्योंकि यहीं कैमरा हमें संत नहीं, पति दिखाई देता है। यही फिल्म की एक बड़ी खूबी है कि वह समय-समय पर उस विराट आध्यात्मिक व्यक्तित्व के पीछे छिपे साधारण मनुष्य को सामने लाती है।और यहाँ एक गंभीर प्रश्न भी जन्म लेता है।
क्या किसी व्यक्ति की आध्यात्मिक यात्रा केवल उसकी अपनी यात्रा होती है या उससे जुड़े लोगों का त्याग भी उस साधना का हिस्सा बन जाता है?
‘हनुमानअंश’ इस प्रश्न का कोई दार्शनिक उत्तर नहीं देती, लेकिन रामबेटी के माध्यम से उसे महसूस अवश्य कराती है।
इसके बाद फिल्म नीम करौली बाबा से जुड़े उन प्रसंगों की ओर बढ़ती है जिन्होंने समय के साथ उनके व्यक्तित्व को लोकविश्वास का हिस्सा बनाया। रेल से जुड़ा प्रसिद्ध प्रसंग, जिसके साथ ‘नीमकरौली’ नाम की कथा जोड़ी जाती है पार्वती दीदी से संबंधित प्रसंग ,सांप की घटना , हनुमान जी की मूर्ति की स्थापना और बाबा के जीवन में हनुमान-भक्ति का केंद्रीय स्थान फिल्म इन प्रसंगों को भक्तिपरक दृष्टि से प्रस्तुत करती है।
यहां फिल्म को समझने के लिए एक बात विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण है।
इन घटनाओं को केवल ऐतिहासिक तथ्य की तरह देखने के बजाय उन्हें लोक-स्मृति और आस्था के आख्यान के रूप में देखना अधिक उचित है। संतों की जीवन-कथाओं में इतिहास, स्मृति, अनुभव, विश्वास और किंवदंती अक्सर एक-दूसरे में घुल जाते हैं। सिनेमा जब ऐसी कथा को अपनाता है तो उसका काम केवल प्रमाण प्रस्तुत करना नहीं बल्कि उस विश्वास की सांस्कृतिक संरचना को दृश्य रूप देना भी होता है।‘हनुमान अंश’ इसी दिशा में प्रयास करती है।चमत्कार दिखाना आसान है, अनुभूति पैदा करना कठिन यहीं फिल्म की वास्तविक सिनेमाई चुनौती सामने आती है।
कैमरा किसी घटना को रिकॉर्ड कर सकता है, लेकिन किसी चमत्कार की अनुभूति को रिकॉर्ड नहीं कर सकता। उस अनुभूति के लिए दृश्य, प्रकाश, ध्वनि, संगीत, अभिनय, मौन और कैमरे की गति सबको एक साथ काम करना पड़ता है। फिल्म के कई दृश्यों में निर्देशक ने इसी वातावरण को निर्मित करने की कोशिश की है। आध्यात्मिकता को केवल संवादों में व्यक्त करने के बजाय वातावरण और दृश्य संरचना के माध्यम से महसूस कराने का प्रयास दिखाई देता है।
यहां फिल्म की गति भी उल्लेखनीय है। यह लगातार घटनाओं के पीछे भागने के बजाय कई जगह ठहरती है। और आध्यात्मिक व्यक्तित्व पर बनी फिल्म के लिए यह ठहराव आवश्यक भी है।क्योंकि साधना की गति हमेशा कथा की गति नहीं होती।
नीम करौली बाबा की भूमिका में शोभिनव सत्या का अभिनय फिल्म के प्रमुख आकर्षणों में है।उनके अभिनय की सबसे उल्लेखनीय विशेषता बाहरी समानता से अधिक उनकी देह-भाषा और आंतरिक स्थिरता है। बाबा को निभाते हुए वे अत्यधिक नाटकीयता से बचते हैं। चेहरे की शांति, दृष्टि का ठहराव, संवादों के बीच का मौन और शरीर की न्यूनतम गति इन सबके माध्यम से चरित्र के भीतर की आध्यात्मिकता को व्यक्त करने का प्रयास दिखाई देता है।
यह भी दिलचस्प है कि वे मूलतः फिल्म की टीम से सहायक निर्देशक के रूप में जुड़े थे और परिस्थितिवश उन्हें मुख्य भूमिका निभाने का अवसर मिला। हम अभिनय में अक्सर कहते हैं कि चरित्र को केवल ‘किया’ नहीं जाता, उसे जिया जाता है। कैमरा इस प्रक्रिया को और कठिन बना देता है, क्योंकि वह अभिनेता की आंखों और चेहरे के सूक्ष्मतम परिवर्तन तक को पकड़ लेता है। इस भूमिका में सत्या कई जगह अभिनय से आगे जाकर आंतरिक उपस्थिति निर्मित करते दिखाई देते हैं।
हालांकि फिल्म में चमत्कारों से जुड़े प्रसंग हैं, लेकिन मेरे लिए ‘हनुमानअंश’ का वास्तविक केंद्र चमत्कार नहीं है।फिल्म का मूल भाव है सेवा, करुणा, भक्ति और आत्मसमर्पण। यही वह जगह है जहां नीम करौली बाबा का व्यक्तित्व केवल धार्मिक आख्यान से निकलकर व्यापक मानवीय विमर्श का हिस्सा बनता है। बाबा की आध्यात्मिकता को यदि केवल चमत्कारों में सीमित कर दिया जाए तो उनके व्यक्तित्व की सबसे महत्त्वपूर्ण विशेषता छूट जाती है। उनके जीवन की चर्चा में सेवा और मनुष्य के प्रति करुणा का भाव बार-बार सामने आता है। फिल्म भी इसी मानवीय आध्यात्मिकता को पकड़ने की कोशिश करती है। इस अर्थ में ‘हनुमानअंश’ हनुमान-भक्ति की फिल्म भर नहीं है यह उस मानसिकता की फिल्म है जिसमें सेवा स्वयं साधना बन जाती है।
फिल्म की सबसे रोचक कहानी पर्दे के बाहर भी लिखी गई है। लगभग ₹2करोड़ से कम के बजट में बनी फिल्म की शुरुआत बेहद मामूली रही। शुरुआती दिनों में दर्शक संख्या और कमाई दोनों सीमित रहे। लेकिन धीरे-धीरे दर्शकों की प्रतिक्रिया बदलने लगी। फिल्म को wordofmouth का लाभ मिला और दर्शकों ने स्वयं इसे आगे पहुंचाना शुरू किया। शुरुआती लगभग ₹10 लाख की ओपनिंग से आगे बढ़ते हुए फिल्म ने कुछ ही सप्ताह में ऐसी रफ्तार पकड़ी जिसकी कल्पना शायद इसके शुरुआती प्रदर्शन को देखकर नहीं की जा सकती थी।
और जब फिल्म ने घरेलू बॉक्स ऑफिस पर ₹100करोड़ का आंकड़ा पार किया, तब यह केवल एक व्यावसायिक सफलता नहीं रही यह भारतीय दर्शक की बदलती पसंद को समझने का एक दिलचस्प उदाहरण बन गई।यहाँ एक समीक्षक के लिए असली प्रश्न यह नहीं है कि फिल्म ने कितना कमाया, बल्कि यह है कि दर्शक आखिर इस फिल्म तक क्यों लौटकर आया? इसका उत्तर शायद फिल्म के विषय में ही छिपा है।एक ओर आज का दर्शक तकनीकी रूप से अधिक सजग है, दूसरी ओर उसके भीतर आध्यात्मिक और आत्मिक प्रश्न भी मौजूद हैं। ‘हनुमानअंश’ ने उस दूसरे हिस्से को संबोधित किया है। फिल्म ने दर्शक को केवल मनोरंजन नहीं दिया उसे विश्वास, सेवा, त्याग और आत्मचिंतन की ओर देखने का अवसर भी दिया।
यही कारण है कि ₹2करोड़ से कम के बजट वाली फिल्म का ₹100करोड़ से अधिक की घरेलू कमाई तक पहुंचना अपने आप में भारतीय सिनेमा के लिए एक उल्लेखनीय घटना है। ‘हनुमानअंश’ की बॉक्स ऑफिस यात्रा एक और महत्त्वपूर्ण संकेत देती है। हम लंबे समय से यह मानते आए हैं कि बड़े बजट, लोकप्रिय सितारे और विशाल प्रचार ही किसी फिल्म को दर्शक तक ले जाते हैं। लेकिन इस फिल्म की यात्रा उस धारणा को चुनौती देती दिखाई देती है। यहाँ दर्शक स्वयं प्रचार का माध्यम बना। एक व्यक्ति फिल्म देखकर दूसरे को बताता है, दूसरा अपने परिवार को लेकर आता है और धीरे-धीरे फिल्म एक सामुदायिक अनुभव में बदल जाती है। इस दृष्टि से ‘हनुमानअंश’ का कलेक्शन केवल आर्थिक आंकड़ा नहीं है यह दर्शकीय विश्वास का आँकड़ा भी है।
फिल्म को देखते हुए मुझे बार-बार कला और साधना के बीच का संबंध दिखाई देता रहा। रंगमंच हमें सिखाता है कि अभिनय केवल तकनीक नहीं है। शरीर, आवाज, भाव, लय और उपस्थिति के पीछे कलाकार का विश्वास भी काम करता है। जब कलाकार किसी विषय को केवल ‘करता’ नहीं, बल्कि उसे भीतर से स्वीकार करता है, तब प्रस्तुति में एक अलग प्रकार की ऊर्जा पैदा होती है।
‘हनुमानअंश’ में यही ऊर्जा दिखाई देती है । हो सकता है कि फिल्म को तकनीकी या सिनेमाई कसौटियों पर लेकर अलग-अलग मत हों। कहीं पटकथा अधिक कसाव मांगती है, कहीं भावुकता पर थोड़ा संयम अपेक्षित है और कहीं आध्यात्मिक अनुभव को और अधिक सूक्ष्म दृश्य भाषा मिल सकती थी। लेकिन इसके बावजूद फिल्म के मूल प्रयास को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। क्योंकि संत की जीवनी बनाना और संत की अनुभूति को पर्दे पर उतारना दो अलग चीजें हैं।‘हनुमान अंश’ ने कम-से-कम दूसरी दिशा में गंभीर प्रयास किया है। और शायद इसी कारण फिल्म की अपनी यात्रा भी उसके विषय की तरह लगती है धीमी शुरुआत, फिर विश्वास, फिर स्वीकार्यता और अंततः अप्रत्याशित विस्तार।
मेरे लिए ‘हनुमानअंश’ केवल एक फिल्म नहीं है। यह श्रद्धा से कला तक, कला से अनुभूति तक और अनुभूति से आत्मचिंतन तक की यात्रा है। और फिल्म समाप्त होने के बाद मन में फिर वही पंक्ति लौटती है :
कला प्रतिभा मांगती है।
कला श्रम मांगती है।
लेकिन महान कला समर्पण माँगती है।\
‘हनुमानअंश’ की सबसे बड़ी उपलब्धि शायद यही है कि फिल्म के पीछे दिखाई देने वाला समर्पण स्वयं उसकी सिनेमाई भाषा का हिस्सा बन जाता है।और जब कला में श्रद्धा जुड़ जाती है, तब सृजन केवल काम नहीं रह जाता वह साधना बन जाता है।
-मनीष पलामू के रहने वाले हैं। अभी वे असिस्टेंट प्रोफेसर, नाटक एवं रंगभूमि विभाग, मराठी भाषा विद्यापीठ अमरावती में कार्यरत हैं।
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