हिमकर श्याम
रांची के मुख्य मार्ग पर स्थित जीईएल चर्च झारखंड का पहला गिरिजाघर है। स्थापत्य की दृष्टि से यह श्रेष्ठ गिरिजाघरों में शुमार है। यह ऐतिहासिक गिरिजाघर न सिर्फ वास्तुकला का अद्भुत नमूना है, बल्कि भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का गवाह भी है।
गोथिक शैली में बने इस गिरिजाघर में लगभग 600 लोगों के बैठने की व्यवस्था है।
1851 में डाली गई थी नींव : जीईएल चर्च का इतिहास जितना पुराना है उतना ही रोचक भी है।
इस विशाल गिरजाघर की स्थापना का श्रेय फादर गोस्सनर को जाता है। इसके निर्माण में फादर गोस्सनर ने तब अपनी ओर से 13 हजार रुपए दिए थे। इसकी नींव 1851 में डाली गयी और 1855 में इसका संस्कार हुआ। 24 दिसम्बर की पुण्य रात को मसीहियों ने यहाँ पहली बार प्रार्थना की। ईस्टर और क्रिसमस त्योहारों के मौके पर यहां भव्य तैयारी की जाती है। ईसाई धर्मावलंबियों को यहां आकर साक्षात प्रभु का अहसास होता है।
विशाल पाइप ऑर्गन और दुर्लभ घंटी : गिरिजाघर में एक विशेष जर्मन पाइप आर्गन है। यह झारखंड क्षेत्र का सबसे बड़ा पाइप ऑर्गन है। इसे मिस्सा के दौरान बजाया जाता है। इसकी मधुर ध्वनि चर्च के माहौल को आध्यात्मिक बनाती है। यहां जर्मनी से मंगवाया गया पहला पाइप ऑर्गन वर्ष 1856 में स्थापित किया गया था जो 1857 के सिपाही विद्रोह में नष्ट हो गया था। पाइप आर्गन एक विशाल वाद्य यंत्र होता जो दबाव वाली हवा को विभिन्न आकार के पाइपों से गुजारकर ध्वनि पैदा करता है। इसके अलावा इस गिरिजाघर में 1860 में जर्मनी से लाई गई दो दुर्लभ घंटी भी है। एक बड़ी है और दूसरी छोटी। छोटी घंटी दरार आने के कारण केवल प्रदर्शनी के लिए रखी गई है। बड़ी घंटी आज भी बजती है। जीईएल चर्च से जुड़े पुराने दस्तावेजों और वस्तुओं को संग्रहित करने के लिए चर्च परिसर में ही अभिलेखागार-म्यूजियम बनाया गया है।
गोस्सनर मिशन और चर्च : भारत में प्रचलित ईसाई धर्म के कई संप्रदायों में एक प्रमुख है गोस्सनर इवेंजेलिकल लुथेरन (जीईएल) चर्च। गोस्सनर मिशन या जर्मन मिशन के नाम से सुपरिचित इस मिशन का नामकरण जर्मनी के फादर गोस्सनर के नाम पर हुआ था। इन्होंने लूथरन सुमदाय की स्थापना की थी और विदेशों में धर्म प्रचारकों को भेजने की योजना बनाई थी।
छोटानागपुर आगमन : छोटानागपुर और असम में गोस्सनर इवेंजेलिकल लूथरन (जीईएल) चर्च की स्थापना आधिकारिक तौर पर 2 नवंबर, 1845 को इन चार जर्मन मिशनरियों-एमिल शेट्ज़, फ्रेड्रिक बैट्सच, ऑगस्टस ब्रांट और ई. थियोडोर जानके द्वारा की गई थी, जो धर्मशास्त्र, शिक्षा औरअर्थशास्त्र में कुशल थे। चारों मिशनरी रेव फादर जोहान्स इवांजेलिस्टा गोस्नर बर्लिन के द्वारा भेजे गए थे। उन्हें बर्मा देश के मेरगुई शहर में सुसमाचार के प्रचार के लिए भेजा था। अपने यात्रा के क्रम में चारों मिशनरी पहले कोलकाता पहुंचे। कोलकाता में इन मिशनरियों की मुलाकात छोटानागपुर के कुछ लोगों से हुई, जो कुली का काम करते थे। बातचीत से उन्हें पता चला कि वे लोग आदिवासी हैं। उन आदिवासियों से मिलकर उनमें गहरी करुणा जागृत हुई और उन्होंने अपने मिशन को छोटानागपुर की ओर पुनर्निर्देशित किया। इन मिशनरियों का छोटानागपुर आगमन दो नवंबर 1845 को हुआ था। उस जमाने में वे बैलगाड़ी से कई दिनों के सफर के बाद रांची पहुंचे। रांची पहुंचने पर, जिस जगह पर पड़ाव डाला, उस जगह को उन्होंने नाम दिया, बेथेसदा (दया का घर)। यही से उन्होंने धर्म प्रचार और सेवा कार्य शुरू किया। छोटानागपुर के तत्कालीन आयुक्त कैप्टन जॉन कोलफील्ड के प्रयास से वर्तमान रांची नगर में छोटानागुर के महाराज ने भूमि प्रदान की थी। ईसाई मिशनरियों के आगमन से इस क्षेत्र में एक बड़ा सांस्कृतिक परिवर्तन और उथल-पुथल शुरू हुआ।
पहला बपतिस्मा : जीईएल चर्च छोटानागपुर व असम के अनुसार यहां पहला बपतिस्मा 25 जून 1846 को मारथा नाम की बालिका का हुआ और वही पहली मसीही है। यह विशेष दिन को प्रथम मसीही दिवस के रूप में जाना जाता है। इस शुभ दिन को जीईएल चर्च कलीसिया बाल दिवस के रूप में मनाती है। मारथा के बाद 26 जून, 1846 को नवीन डोमन, केशो, बंधु और घूरन उरांव का बपतिस्मा हुआ। वृहद रूप में नौ जून 1850 को चार उरांव, 1851 में दो मुंडा, एक अक्टूबर 1855 को नौ बंगाली, आठ जून 1866 को दो खड़िया भाईयों और 10 मई 1868 को एक हो परिवार ने जीइएल चर्च कलीसिया में बपतिस्मा लिया। बपतिस्मा संस्कार मसीही बनने की प्रक्रिया है। धीरे -धीरे बपतिस्मा लेनेवालों की संख्या के साथ कलीसिया भी बढ़ती गई। अब गोस्सनर कलीसिया के विश्वासियों की संख्या तकरीबन 6.5 लाख है।
वर्तमान में इस कलीसिया के दो भाग हैं- नॉर्थ वेस्ट गोस्सनर इवेंजेलिकल लुथरेन चर्च और गोस्सनर इवेंजेलिकल लुथरेन चर्च। 17 अप्रैल, 1869 को गोस्सनर चर्च का विभाजन हुआ और नए चर्च के रूप में एसपीजी मिशन का गठन हुआ। इसका शिलान्यास 12 सितम्बर, 1870 को तत्कालीन आयुक्त जनरल ईटी डाल्टन ने किया। 10 जुलाई 1919 को गोस्सनर कलीसिया को ऑटोनॉमी घोषित किया गया। 1914 को प्रथम विश्वयुद्ध के समय जर्मन मिशनरियों को देश छोड़ने पर बाध्य कर दिया गया। तब जीईएल चर्च की देखरेख का भार एसपीजी चर्च छोटानागपुर के बिशप वेस्टकॉट को सौंपा गया।
जीईएल चर्च नेशनल काउंसिल ऑफ चर्चेज इन इंडिया, यूनाइटेड इवेन्जेलिकल लूथेरन चर्च इन इंडिया, लूथेरन वर्ल्ड फेडरेशन और वर्ल्ड काउंसिल ऑफ चर्चेज़ से जुड़ा हुआ है। देश के 12 राज्यों में जीईएल चर्च की 1896 शाखायें है। जीईएल चर्च असम-झारखंड प्रशासन ही देश के आधे चर्चो की गवर्निग बॉडी है। जीईएल चर्च के मानव संसाधन विकास केंद्र (एचआरडीसी- सीईएसएल) व चर्च कांग्रीगेशन ऑफ़ मिशन हिस्ट्री द्वारा प्रकाशित बिशप एएस हेमरोम की पुस्तक ख्रीस्तान डेरा : कब, क्यों और कैसे के अनुसार 1857 में मसीहियों की संख्या 900 थी, जो 56 गांव-मंडलियों में फैली थी। 1858 तक मसीही मंडलियों की संख्या 230 गांवों में फैल गयी। संख्या की दृष्टि से 1860 के अंत में 1700 मसीही थे। 1868 में चर्च से लगभग 10,000 लोग जुड़ चुके थे। छोटानागपुर में इस चर्च का जनाधार बनाने में इसके सामाजिक सरोकारों की अहम भूमिका रही।
यह सर्वमान्य सत्य है कि उन मिशनरियों का मुख्य उद्देश्य ईसाईयत को प्रचार करना था। लेकिन आदिवासियों की दशा देखकर वे द्रवित हो उठे।
जीईएल चर्च विभिन्न संस्थानों के माध्यम से व्यापक सामुदायिक कार्य में भी संलग्न है, जिसमें स्वास्थ्य देखभाल केंद्र, शैक्षिक सुविधाएं और वृद्धाश्रम और व्यावसायिक प्रशिक्षण केंद्र जैसी सामाजिक कल्याण सेवाएं शामिल हैं। रांची में जीईएल चर्च गोस्सनर कॉलेज, बेथेसदा वीमेंस टीचर्स ट्रेनिंग कॉलेज, बेथेसदा प्राइमरी टीचर्स एजुकेशन कॉलेज, बेथेसदा वीमेंस इंटरमीडिएट कॉलेज, बेथेसदा वीमेंस कॉलेज का संचालन कर रहा है। जीईएल चर्च छाेटानागपुर व असम द्वारा 128 स्कूल चलाये जा रहे हैं। बेथेसदा स्कूल पूरे छोटानागपुर का पहला स्कूल है, जहां बालिकाओं को पढ़ने का अवसर मिला। स्कूल की शुरुआत एक दिसंबर 1852 को हुई थी। इसके अतिरिक्त कई अस्पताल, स्वास्थ्य केंद्र और समाज सेवा संस्थाएं भी चलायी जा रही हैं।
प्रथम स्वतंत्रता संग्राम का गवाह : ब्रिटिश शासनकाल में स्थापित इस गिरिजाघर ने कई उतार-चढ़ाव देखे हैं। 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के दौरान इस चर्च को क्रांतिकारियों के आक्रोश का सामना करना पड़ा था। क्रांतिकारियों द्वारा इस इस गिरिजाघर पर हमला किया गया था। इसको ध्वस्त करने के लिए तोप से चार गोले दागे गए थे। एक को छोड़ कर सभी गोलों का निशान चूक गया था, जिससे कोई विशेष क्षति नहीं हुई। हमले के निशान आज भी गिरिजाघर भवन के पश्चिम भाग में मौजूद हैं। क्रांतिकारियों ने चर्च के अलावा स्कूल भवन और मिशन बंगला और गिरजाघर को क्षतिग्रस्त कर दिया था। विषम परिस्थिति से बचने के लिए गिरिजाघर के पूर्वजों ने रांची से भागकर कारो नदी के तीन टापुओं और जंगल में शरण ली थी। उस वक़्त गिरिजाघर के हारेलोहर साहब ने अपनी बहुमूल्य चीजों-दस्तावेज को एक लोहे के संदूक में बंद कर पिठोरिया के किसी कुंए में डाल दिया था।
गिरिजाघर की घरबंधु पत्रिका : गिरिजाघर द्वारा सन 1872 से घरबंधु पत्रिका निकाली जाती हैं। घरबंधु, रांची ही नहीं झारखंड से प्रकाशित होनेवाली सबसे पुरानी पत्रिका है। झारखंड का, जिसे आम तौर पर चुटिया नागपुर के रूप में जाना जाता है, इतिहास जानने के लिए यह पत्रिका अमूल्य खजाना है। 'घरबंधु' पाक्षिक, मासिक, द्विमासिक के रूप में बदलती रही। पाक्षिक 'घरबंधु', अब एक हिंदी मासिक पत्रिका है। घरबंधु के पुराने अंक गोस्सनर थिअलॉजिकल कॉलेज में सुरक्षित रखे गए हैं। इनमें सन 1872 से चुटिया नागपुर में घटित प्रमुख घटनाओं पर लेख हैं। जीईएल चर्च के सदस्य कई राज्यों में हैं, चर्च से जुड़ी गतिविधियों की ख़बर उन्हें इसी पत्रिका के माध्यम से मिलती है। इसके पहले सम्पादक पादरी रेवरेंड एनाट रॉड थे।
महिला पादरी : 26 अक्टूबर 2000 को रांची के ख्रीस्त गिरजाघर जीईएल चर्च में पहली बार तीन महिलाओं को पुरोहित के रूप में अभिषेक किया गया। इनमें पादरी मेरीयन मिंज, ऐजाबेला बारला और आसिशन कंडुलना शामिल है। इन्हीं तीन नामों से महिला नेतृत्व की यात्रा शुरू हुई, जो अब 52 महिला पादरियों तक पहुंच चुकी है। झारखंड, ओडिशा, असम, पश्चिम बंगाल, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश समेत सात राज्यों में महिला पादरी चर्च के विभिन्न पदों पर कार्यरत हैं
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