1. पिता की डायरी
पिता की डायरी में मुकदमे की तारीखें हैं दूध और चाय- चीनी - पत्ती के खर्चो के ब्यौरे नेवता - पेहानी के दिन भी दर्ज हैं
लिखा यह भी है कि कल कहां गया था और कल कहां जाना है किससे लिया कितना उधार और किसने देने से साफ - साफ किया इन्कार
पिता की डायरी में उनकी अपनी कोई बात दर्ज नहीं है न ही दर्ज है किसी कवि की प्रेरक कविता
पिता की डायरी का लगभग हर आधा पन्ना खाली है लेकिन रोज की तारीख में कुछ न कुछ दर्ज है समय के साथ डायरी के पन्ने नीले हो गए हैं नीली स्याही फैल गई है पूरे पृष्ठ पर
अक्षर अक्षरों से मिलकर गड्ड-मड्ड हो गए हैं
पिता की डायरी में सब कुछ दर्ज है उनके आंसुओं के सिवा यह डायरी आज भी बंद है काठ के संदूक में उसकी चाबी कील पर टंगी हुई है उसे कोई नहीं छूता वह किसी के काम की चीज भी नहीं है।
2. गांधी चौक के समोसे
बढ़े हुए कोलेस्ट्रॉल में भी मन ललच जाता है समोसे के लिए अनायास स्कूटी घूम जाती है गांधी चौक की गली में
और लबालब घुघनी में नहाए हुए समोसे का दोना हाथ में आने के पहले जीभ पनिया जाती है मन करता है एक पीस और ले लूं आज शुगर की बात भुलाकर गरम - गरम गुलाबजामुन से मुंह मीठा करना मांगता है
इन सब के बीच दिमाग के मेमोरी बाॅक्स से उभर कर सामने आ जाता है एक लड़का जो कहीं से गरीब नहीं लग रहा था और जैसे ही जीभ पर रखा था एक चम्मच समोसा उसने कहा था - मुझे भी चाहिए एक समोसा
यह कहकर वह विद्युत गति से निकल गया मैं उसे पुकार नहीं सका
अब जब कभी गांधी चौक पर जाता हूं उस लड़के की बहुत याद आती है मन आज भी ललचता है समोसा के लिए लेकिन वैसा स्वाद नहीं आता है
अब समोसे के मसाले में करुणा शामिल हो गई है गांधी चौक के समोसे से कहीं अधिक उस लड़के की याद आती है।
3. सावन
खिड़की से छुप- छुपकर देख रहा हूं आकाश रंग- बिरंगी पिचकारियों के साथ होली खेल रहा है बादल दूर से बरस रहा है जैसे कोई देवर भाभी की देह का स्पर्श किये बिना रंग से सराबोर कर देता है
नदियां पिया- मिलन का गीत गा रही हैं सहेलियों संग समंदर से मिलने जा रही हैं
धरती की चुनरी मटमैली हो गई है पेड़ - पौधे खुशी से झूम रहे हैं दादुर मोर सब नाच रहे हैं,चहक रहे हैं ये मेंढक- ढाबुसों ने धारण कर लिया है पीला चोला सब के सब निकल पड़े हैं बिवर से
पावन - परिणय के इस अनुपम आयोजन में कण - कण व्यस्त हैं, मस्त हैं सावन झूम रहा है अहा,देखो तो तुम भी किस तरह धरा को चूम रहा है!
4. कील
पेड़ों में तुमने कील ठोंक दी उन पर लगा दी एक पट्टिका दर्ज कर दिया हरेक पर नंबर
पेड़ों के पास तुम्हारी निर्ममता बर्दाश्त करने के सिवा कोई विकल्प नहीं था वे विरोध नहीं कर सकते थे वे भयातुर हुए उन्हें असह्य पीड़ा हुई वे किससे और कहां शिकायत दर्ज कराए
तुमने तर्क दिया कि पेड़ों को सूचीबद्ध करना जरूरी था अब इन्हें कोई इन्हें चोरी से काट नहीं सकता इनका डेटा कंप्युटराइज्ड हो चुका है
इस प्रकिया में दर्ज नहीं हो सकी कहीं पेड़ों की पीड़ा,उनकी कोई शिकायत विरोध तो दर्ज होने का सवाल ही नहीं था तुमने पेड़ों को दिया युनिक नंबर पेड़ों के पास अगर होती एक मुक्कमल भाषा तो वे चीख - चीख कर कहते - अपने चेहरे पर धब्बे लेकर हम नहीं जीना चाहते क्षण भर पेड़ बगैर अपनी विशिष्ट पहचान के खुशी से झूम रहे थे
पेड़ों की छांव तले गुजरते हुए हर बार मुझे अपने अपराध का एहसास होता है मैं नज़रें झुकाए तेजी से निकल जाता हूं लगता है मेरी छाती पर भी कुछ क्रूर हाथों ने कील ठोंक दी है ।
5. कविताएं चिट्ठियां हैं
कोई भी विकल्प पूरा नहीं होता पर चिट्ठियों के विकल्प ढूंढ लिये गए अब कोई डाकिए का इंतजार नहीं रहता
लोग व्यस्त हो गए भावनाओं को की त्वरित अभिव्यक्ति के तौर पर शब्दों का भी विकल्प ढूंढ लिया बनी- बनाई इमोजी चिपकाई और चलते बने
आजकल खूब लिखी जा रही हैं कविताएं जबकि कविता सुनने से लोग कतराने लगे हैं सच यह भी है कि लोग कहानियों से भी घबराने लगे हैं
इन प्रतिकूल परिस्थितियों में जब भी मन होता है उदास मैं अनाम लोगों के नाम चिट्ठियां लिखता हूं मेरी सारी कविताएं चिट्ठियां हैं मुझे किसी के उत्तर की प्रत्याशा नहीं मैं कविताएं लिखता रहूंगा कविता जिस दिन रूठ जाएगी वह दिन मेरे लिए कितना भयावह होगा मैं बतला नहीं सकता।
जन्म: 10मई 1966 को नारायणी नदी के तट पर स्थित मुजफ्फरपुर (बिहार) के बैजलपुर ग्राम में
शिक्षा: एम.ए (हिन्दी), यू जी सी नेट जेआरएफ,बी.एड
प्रकाशित कृतियां: प्रश्नकाल का दौर , बुद्धिजीवी और गधे(दो व्यंग्य संग्रह) ईश्वर की डायरी,यह देवताओं के सोने का समय है और आवाज घर( तीन कविता संग्रह) के साथ- साथ स्तरीय पत्र - पत्रिकाओं एवं प्रमुख वेब पोर्टलों पर कविताएं , आलोचना एवं व्यंग्य प्रकाशित।
संप्रति: सहायक निदेशक ( राजभाषा) पद से सेवानिवृत्ति के बाद पूर्णकालिक लेखन एवं रांची में निवास संपर्क: lalancsb@gmail.com

Comments (0)
Write first comment
Please Login to write comment