रजीउद्दीन अकील
तेरहवीं और चौदहवीं सदी में दिल्ली सल्तनत के पाँच प्रमुख चिश्ती सूफियों का जीवन-चरित और उनकी आध्यात्मिक शिक्षा ऐतिहासिक दृष्टिकोण से बहुत महत्वपूर्ण हैं। मध्यकालीन भारत के सामाजिक और सांस्कृतिक इतिहास में सूफी संतों की अहम भूमिका को समझने के लिए यह अत्यंत प्रासंगिक हैं, और आज के समय में भी इनका महत्व बना हुआ है। भारत की मिली-जुली संस्कृति को बनाने में चिश्ती सूफियों के योगदान और उनके जीवन चरित के महत्त्व को उजागर करना जरुरी है। अपने काम के जरिए चिश्ती सूफियों ने मुस्लिम समाज का एक ऐसा चेहरा दिखाया जो सहिष्णु और सबको साथ लेकर चलने वाला था। भारतीय समाज की कई धाराएं अपनी अद्भुत विविधता और परस्पर सम्मान के साथ एक-साथ रहती आयीं हैं, हालांकि कई बार धार्मिक लामबंदी के हिंसक दावों के दौर में इस पहलू को नजरअंदाज कर दिया जाता है। सूफियों और संतों ने लोगों को एक दूसरे के साथ जोड़ने की कोशिश किया था।
ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती के मशहूर शिष्य और उत्तराधिकारी ख्वाजा कुतबुद्दीन बख्तियार काकी (1173 – 1235 ईस्वी) ने, जो दिल्ली में बस गए थे और जिनके नाम पर दिल्ली की शानदार इमारत कुतुब मीनार का नाम रखा गया था, चिश्ती आध्यात्मिक परंपरा को आगे बढ़ाया। तेरहवीं शताब्दी के शुरु के दशकों में, दिल्ली का सुल्तान नासिरुद्दीन इल्तुतमिश आपका बड़ा अनुयायी था। दिल्ली के कॉस्मोपॉलिटन और बहुलतावादी स्वरुप की नींव और उसे आकार देने का काम इन दो महत्वपूर्ण हस्तियों—सूफी और सुल्तान—ने किया था। बख्तियार काकी सूफी कव्वाली या महफिले-समा के बड़े शैदाई थे। विख्यात है कि आपका स्वर्गवास भी कव्वाली के एक कार्यकर्म में एक शेर से पैदा हुए सुरुर, या आध्यात्मिक आनंद, की अवस्था में हुआ था। उस फारसी कविता की यह दो पंक्तियां मशहूर हैं:
कुश्तगाने खंजरे तस्लीम रा
हर जमान अज गैब जानी-ए दीगर-अस्त
(अर्थात, ईश्वर की इच्छा के आगे समर्पण के खंजर के शिकार लोगों को हर क्षण गैब से एक नई जिंदगी मिलती है।)
सुल्तान इल्तुतमिश ने आपके जनाजे की नमाज पढ़ाकर आपकी स्वयं चुनी हुई जगह पर सुपुर्द-खाक किया। आज के दक्षिण दिल्ली के महरौली में कुतुब मीनार के नजदीक ही, आपकी मजार एक बड़ी दरगाह और तीर्थस्थान है।
बख्तियार काकी के मुरीद और चिश्ती सिलसिले में आपके खलीफा या उत्तराधिकारी, ख्वाजा फरीदुद्दीन गंज-शकर (शेख फरीद या बाबा फरीद, 1173 – 1265 ईस्वी) को दिल्ली की सियासी हवा पसंद नहीं थी। इसलिए, आपने शहरी गहमा-गहमी से दूर पंजाब के एक बंजर गांव को अपना ठिकाना बनाया। आज पाकिस्तान के पंजाब में अजोधन या पाक-पटन के नाम से मशहूर उसी जगह पर आपकी दरगाह दबे कुचले जनमानस और सूफी-अध्यात्म की ओर आकर्षित लोगों का जलवा-गाह है। लाल शाहबाज कलंदर और बुल्हे शाह सूफीमत के उसी वृहत परंपरा के हिस्सा हैं। शायरों और कव्वालों ने अपनी रचनाओं और संगीत से उन्हें अमर कर दिया है, जैसा कि इस काव्यात्मक तकरार में सुनने को मिलता है: दमादम मस्त कलंदर, अली दा पहला नंबर। स्वयं बाबा फरीद की पंजाबी और उर्दू रचनाएं, इन भाषाओं के साहित्य के शुरुआती दौर में, ऐतिहासिक भूमिका निभाती हैं। अपने एक अनुयायी को आपने यह उपदेश दिया था कि उपहार में वह सुई ला सकते हैं जिसका काम जोड़ने का होता है, गिफ्ट के तौर पर किसी को चाकू नहीं देना चाहिए जिसका काम काटने का होता है। बेचारा मुरीद तोहफे में छुरी लेकर आया था। इस तरह, सूफी संत आसानी से अपने शिष्यों को अच्छा इंसान बनने की तरबियत करते थे।
बाबा फरीद के सबसे प्रिय शिष्य और चिश्ती सिलसिले में उनके उत्तराधिकारी, दिल्ली के हजरत ख्वाजा निजामुद्दीन औलिया ( 1238 – 1325 ईस्वी) ने सूफीमत की तमाम अच्छाइयों को अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में ढालते हुए, न सिर्फ एक उत्कृष्ट मिसाल पेश किया, ब्लकि दशकों तक अपने अनुयायिओं की बहुत बड़ी तादाद को अपनी ओर आकर्षित किया। इनमें अमीर खुसरौ और अमीर हसन जैसे बड़े शायर के अलावा इतिहासकार जिया बरनी भी शामिल थे। आपने यह सीख दिया के आशिकों के साथ बैठो और आशिकी का गम खाओ, और जो आशिक न हो उसके करीब काम जाओ। आपके मलफूजात या रुहानी वार्तालाप का संग्रह, फवायदउल फुआद, यानि दिलों के फायदे, आपके जीते जी लोकप्रिय सूफी साहित्य का हिस्सा बन चुका था। चौदहवीं शताब्दी के आरंभिक चौथाई में, तुगलक सुल्तान गियासुद्दीन ने निजामुद्दीन औलिया को कव्वाली, जो सूफी अध्यात्म का एक प्रमुख हिस्सा है, को सुनने से रोकने का नाकाम प्रयास किया। हजरत निजामुद्दीन द्वारा सुल्तान के लिए कहा गया वक्तव्य, हनूज दिल्ली दूर अस्त, अर्थात दिल्ली अभी दूर है, लोक-संस्कृति में सत्ता के अहंकार के प्रति विरोध का हिस्सा है। शासक ने सूफी संत को दिल्ली खाली करने का फरमान जारी किया था, लेकिन इससे पहले कि वह कोई कार्रवाई करता खुद मारा गया। सुल्तान की कब्र कहाँ है किसी को पता नहीं, न ही इसमें किसी की कोई दिलचस्पी है। वहीं दिल्ली में हजरत निजामुद्दीन की दरगाह भारतीय सूफियों के पवित्र भूगोल के केंद्र की हैसियत रखती है।
हजरत निजामुद्दीन औलिया ने अपने बहुसंख्य अनुयायियों में से शेख नसीरुद्दीन चिराग दिल्ली (1274 – 1356 ईस्वी) को चिश्ती सिलसिला में अपना मुख्य उत्तराधिकारी बनाया था। सुल्तान गियासुद्दीन के बेटे मोहम्मद बिन तुगलक, जो अपने मनमानी तुगलकी फरमान के लिए इतिहास में बदनाम है, ने शेख नसीरुद्दीन और दिल्ली के दूसरे सभी बड़े सूफियों को नाना प्रकार से प्रताड़ित किया। अपनी राजधानी को दकन में दौलताबाद (देवगिरी) स्थानांनतरित करने के नाम पर सुल्तान ने शेख नसीरुद्दीन को भी दिल्ली छोड़ने का आदेश दिया था। लेकिन सूफी संत दक्षिण दिल्ली में अपने स्थान पर टिके रहे। कहा जाता है कि उस दौर की उजड़ती हुई दिल्ली में सिर्फ उन्हीं के घर और जमातखाना, जहाँ वह रहते और अपने अनुयायियों से मिलते थे, में रात के अंधेरे में जलते हुए चिराग की रोशनी देखने को मिलती थी। इसीलिए, शेख नसीरुद्दीन के साथ चिराग का लकब जुड़ गया, और उनकी दरगाह का इलाका आज चिराग-दिल्ली के नाम से मशहूर है। सुल्तान के साथ सूफी संत के कड़वे संबंध का अंत आखिर शासक की बिमारी की अवस्था में सुदूर सिंध में एक नाकाम शासक के रुप में निधन से हुआ। वहीं दूसरी ओर लोगों और दुनिया से निरंतर हटकर रहने की अपनी कोशिश के बावजूद, शेख नसीरुद्दीन चिराग जीते जी मशहूर हुए और स्वर्गवास के बाद भी सदियों से लोगों में मकबूल रहे हैं।
इस तरह, अपनी साधना के जरिए, चिश्ती सूफी संतों ने मध्यकाल में मुस्लिम समाज का एक ऐसा रुप दिखाया जो सहिष्णु और सबको साथ लेकर चलने वाला था। अक्सर इस्लाम के नाम पर होने वाले आक्रमक वाद-विवाद और सियासत के दौर में इस पहलू को नजरअंदाज कर दिया जाता है। सूफी परंपराओं से जुड़े कुछ अहम विषयों और मुद्दों में शामिल हैं—विवादित प्रथाएँ जैसे करामात या चमत्कार, गरीबों और जरूरतमंदों में दुआ-तावीज और मन्नत की अवधारणा पर निर्भरता, सूफी-संगीत की महफिलें, एवं कव्वाली और प्रेम-काव्य के अन्य रुप; साथ ही, सुन्नी इस्लाम के संरक्षकों और शासक वर्ग (खासकर दिल्ली के सुल्तानों) के साथ उनके संबंध, जिनके साथ सत्ता के अधिकार को लेकर उनका टकराव भी होता था। यह सभी पहलु मिलकर सूफी दरगाहों के इर्द-गिर्द सांस्कृतिक उपलब्धियों, आपसी भाईचारे और आध्यात्मिक माहौल वाली एक स्थायी एवं सुखद परंपरा को बनाने में योगदान देते हैं। एक परिष्कृत ह्रदय और आत्मा की शुद्धि की चेष्टा तथा विकास जो, आस्था और श्रद्धा की पवित्रता के साथ, ईश्वर के प्रति प्रेम में पूरी तरह समर्पित हो, और चूँकि ईश्वर ही सब कुछ रचने वाले माने जाते हैं, इसलिए उनकी सभी रचनाओं के प्रति (चाहे वह वृक्ष और पशु ही क्यों न हों) प्रेम और सम्मान भी चिश्ती सूफीवाद की महत्वपूर्ण विशेषताएँ हैं। चिश्ती परंपरा में, महिलाओं के लिए भी विशेष सम्मान एवं आदर की भावना देखने को मिलती है। मध्यकालीन संतों ने हमेशा प्रेम और सहिष्णुता का पाठ पढ़ाया था। इस ऐतिहासिक यथार्थ पर निरंतर जोर देने की आवश्यकता है।
(यह निबंध लेखक के नई दिल्ली में जामिआ मिल्लिया इस्लामिया के इतिहास और संस्कृति विभाग में दिए गए एक हालिया लेक्चर पर आधारित है। लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में इतिहास विभाग में प्रोफेसर हैं।)

Comments (0)
Write first comment
Please Login to write comment