-डा. हरेन्द्र प्रसाद सिन्हा
जब बात संस्मरण लिखने की आए और वो भी डा. राम दयाल मुंडा
(23 अगस्त 1939-30 सितंबर 2011) जैसे बहुआयामी व्यक्तित्व के स्वामी की, तो समझ में नहीं आता कि इस ‘हरि अनंत हरि कथा अनंता’ की शुरूआत कहां से की जाए। ‘क्या भुलूं क्या याद करूं’ वाली स्थिति आसन्न है। फिर भी शुरूआत तो करनी ही है, तो फिर शुरू से ही क्यों न शुरूआत की जाए ?
वर्ष 1986 में देवेन्द्र नाथ सिंहकु, बिहार वित्त सेवा के पदाधिकारी होते हुए भी, मेरे नियंत्री पदाधिकारी के रूप में निदेशक, कला संस्कृति के पद पर पदस्थापित थे। तत्कालीन शिक्षा सचिव अरूण पाठक की पसंद थे सिंहकु। विद्वान, सरल चित्त, अस्त व्ययस्त रहने वाले सिंहकु साहब से मेरी अक्सर तकरार होती रहती थी क्योंकि कुछ सहकर्मी उनकी सरलता का लाभ उठा कर उनसे बहुत रुपये पैसे खर्च कराते रहते थे जिसका मैं विरोध किया करता था। बहरहाल, एक बार सिंहकु साहब का रांची चलने का आदेश हुआ क्योंकि उस वर्ष रांची में युवा महोत्सव का आयोजन कराने का निर्णय हुआ था।

रांची पहुंचने के पश्चात् सिंहकु साहब ने सबसे पहले रांची विश्वविद्यालय के उप-कुलपति से मिलने का निर्णय लिया। उप-कुलपति के कक्ष में प्रवेश करते ही मैंने अपने आप को एक विशाल व्यक्तित्व के सामने खड़ा पाया। अभी मैं संभलता तबतक वो खड़े होकर इतने तपाक और आत्मीयता से सिंहकु साहब से मिले कि मेरी स्वयं की हिचकिचाहट भी स्वतः समाप्त हो गई। उनसे मेरा परिचय सिंहकु साहब ने अपने एक सहयोगी पदाधिकारी के रूप में कराया और जल्द ही मुझ अकिंचन को भी उन्होंने अजनबी न रहने दिया। उस दिन पहले उन्होंने अपने वृहत्तर झारखंड के सपनों की ढेर सारी बातें बताईं फिर युवा महोत्सव आदि की चर्चा भी विस्तृत रूप से हुइ। तो ये थी डा मुंडा से मेरी पहली मुलाकात! इसके बाद विभिन्न कार्यक्रमों में या उनके पटना प्रवास के दौरान मुलाकातों का सिलसिला जारी रहा।
धुमकुड़िया के लिए आवंटित जमीन
उनसे घनिष्ट होने का और उनके व्यक्तित्व को करीब से देखने-परखने का सही अवसर मुझे तब मिला जब झारखंड राज्य सृजित होते ही मेरी पदस्थापना नवंबर 2000 में रांची में कला संस्कृति विभाग के अंतर्गत हो गई। उन्होंने मुझे पहली जिम्मेदारी यह दी कि खूंटी में जनजातीय कलाकारों के लिए धुमकुड़िया के लिए आवंटित जमीन पर निर्माण कार्य शुरू कराने के लिए मैं जिला प्रशासन का सहयोग प्राप्त करने में उनकी मदद करूं। धुमकुड़िया के नक्शे के साथ वो मुझे लेकर खूंटी गए और जमीन का वह टुकड़ा भी दिखलाया जिसपर एक छोटा सा भवन भी पहले से निर्मित था और जहां कुछ जनजाति वर्ग के युवा प्रशिक्षण कार्य आदि भी चला रहे थे। किंतु अंत-अंत तक उनके प्रयासों के बावजूद धुमकुड़िया का निर्माण वहां नहीं हो सका।
खुखरागढ़ का पुरातात्विक उत्खनन कार्य
जिस घटना ने हम दोनों को परस्पर एक दूसरे के विषय में बेहतर ढंग से जानने का मौका दिया वो था खुखरागढ़ का पुरातात्विक उत्खनन कार्य और इसमें कुछ असामाजिक तत्वों द्वारा कार्य स्थल पर लगातार उत्पन्न की जा रही कुछ समस्याएं। मुझे भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग, नई दिल्ली से बेड़ो प्रखंड के समीप स्थित खुखरागढ़ की खुदाई की अनुमति मिल गई थी और खुदाई शुरू करने के उपरांत अच्छे परिणाम भी मिलने लगे थे किंतु आपराधिक प्रवृत्ति के कुछ लोग कुछ राशि आदि अनियमित ढंग से प्राप्त करने के उद्देश्य से उत्खनन कार्य में तरह तरह से बाधा उत्पन्न करने लगे। तत्कालीन संस्कृति मंत्री, जो उसी क्षेत्र के जन-प्रतिनिधि हैं, ने मुझे पूर्ण संरक्षण प्रदान किया और असामाजिक तत्वों द्वारा उत्खनन के संबंध में फैलाई जा रही अफवाहों को रोकने के लिए उन्होंने मुख्यतः जनजाति समुदाय के विद्वानों की एक बैठक बुलवाई जिसमें मुझे उत्खनन के संबंध में पावर प्वाईंट प्रेजेन्टेशन देने को कहा गया। इस बैठक के अध्यक्ष डा. मुंडा थे और पावर प्रेजेन्टेशन के बाद विद्वानों ने, जिसमें डा. बी. पी. केशरी, डा. गिरिधारी राम गौंझू, डा. प्रकाश चंद्र उरांव, डा. लक्ष्मण उरांव, डा. हरि उरांव आदि जैसे अनेक विद्वान उपस्थित थे। मुक्त कंठ से उत्खनन कार्य की प्रशंसा की तथा मेरा सौभाग्य कि इसके बाद डा. मुंडा का अनवरत संरक्षण मुझे प्राप्त हुआ, समस्याएं सुलझीं और वो मेरे साथ आगे भी अनेक पुरातात्विक अन्वेषणों में भी शरीक रहेे।
डा मुंडा रुचि पुरातत्व में इस कदर बढ़ गई कि अक्सर वो अपनी गाड़ी लेकर मेरे कार्यालय में आ जाते और हम दोनों खूंटी के अंदरूनी क्षेत्रों में मेगालिथ्स की खोज में निकल जाते। जबसे उन्होंने ये जाना कि मैं मुंडा जनजाति के मृतक संस्कारों के संदर्भ में मेगालिथ्स पर काम कर रहा हूं, वो हर तरह से मुझे और मदद करने लगे। उन्होंने बताया कि त्रिपुरा, मणिपुर आदि राज्यों में और बड़े बड़े आकार के मेगालिथ्स पाए जाते हैं और उनका विचार था कि एक बार हमलोग पूर्वांचल के मेगालिथ्स का अध्ययन करने भी जाएंगेे, पर मेरी बदकिस्मती, ऐसा संयोग न जुट सका।
सिंगुआ छऊ नृत्य
झारखंड के छऊ नृत्यों की चार शैलियों में से सिंगुआ शैली लगभग मृतप्रायः हो चुकी थी। एक दिन अपनी खास शैली में डा. मुंडा ने योजना बनाई, मुझे साथ लिया और साइको से आगे एक पहाड़ी पर स्थित रांगरौंग गांव लेकर चले गए, जहांं संभवतः उनका ममहर भी है। इस अभियान में गंदुरा मुंडा तथा डा. गौंझू जी आदि विद्वान भी साथ आए। वहां मुझे गांव के कुछ कलाकारों के माध्यम से सिंगुआ छऊ नृत्य के कुछ टुकड़े दिखलाए गए और डा मुंडा ने कहा कि इस शैली की रक्षा और विकास के लिए अपने विभाग के माध्यम से कुछ प्रयास कीजिये। उनका संदर्भ देकर इस शैली का प्रशिक्षण गुरु शिष्य परम्परा में कराने की व्यवस्था विभाग से कराई गई। जब प्रशिक्षण के उपरांत गुरु मुंडा का दल तैयार हो गया तब इसे विभाग की तरफ से अन्डमान निकोबार द्वीप समूह, कोलकाता, दिल्ली, जम्मू कश्मीर, ओडिशा तथा राजस्थान आदि जैसी जगहों पर कार्यक्रम प्रस्तुत करने के लिए भेजा गया जहां इन्हें खूब प्रशंसा मिली। आज इस शैली के अनेक दल कार्यरत हैं तथा यह शैली पुनर्जीवित हो चुकी है जिसका पूरा श्रेय डा. मुंडा को जाता है।
तात्पर्य यह, कि बावजूद इसके कि उन्हें सांसद पद का गुरुतर भार दे दिया गया था जिससे उनकी व्यस्तता बहुत बढ़ गई थी, उन्होंने प्राण-पण से राज्य की कला, संस्कृति, पुरातत्व एवं विभिन्न जनजातीय तथा क्षेत्रीय भाषाओं के साथ साथ कलाकारांे, साहित्यकारों के विकास के लिए आजीवन काम किया। अन्य विषयों के लिए भी उनकी रुचि जगजाहिर है। परन्तु मेरी स्पष्ट धारणा है कि चूंकि वो एक निहायत सरल, सहज और ईमानदार व्यक्ति थे, इसी कारण कई सरकारी स्तरों पर उनके प्रस्तावों को लम्बित छोड़ दिया जाता रहा, वही अगर वो थोड़ी कड़ाई बरतते तो जनहित के उनके कई कार्य मूर्त रूप पा जाते। अगर उनके प्रस्तावों पर सही और सामयिक निर्णय लेकर कार्रवाइयां की गई होतीं तो झारखंडा की पारम्परिक संस्कृति के क्षेत्र में भी श्रेष्ठ अंतःसंरचनाओं की कमी नहीं होती। किंतु अफसोस है कि हमें हीरों की कद्र नहीं मालूम।
छोटी-छोटी घटनाएं
उन से संबंधित कई छोटी-छोटी घटनाएं याद आती हैं तो लगता है कि हमारी धरती पर देवता स्वरूप ऐसा सरल और सहज व्यक्ति आकर चला गया और हम उसे पहचान भी न सके रोक भी न सके!
मुझे कोई काम सौंपने के लिए मेरे निवास पर आने से भी वो महामानव गुरेज न करता था। एक बार उनकी इच्छा हुई कि मेरी धर्मपत्नी डा. नूतन सिन्हा के हाथ का बना हुआ भोजन करें। कई मौकों पर पुरातात्विक यात्राओं में पुरातत्वविद के रूप में हमारे साथ श्रीमती सिन्हा भी साथ रहती थीं और रास्ते में खाने पीने की पक्की घरेलू व्यवस्था रखती थीं। बस, कोई मौका खेाजकर तुरंत प्रीति भेाज का निमंत्रण भेजा गया जिसमें डा. केशरी और डा. गौंझू भी शामिल हुए। भोजन चाहे जैसा भी बना हो, उनकी प्रतिक्रिया के संबंध में श्रीमती सिन्हा कहती हैंः ‘‘उन्होंने और अन्य अतिथियों ने शिष्टाचारवश भोजन की खूब तारीफ की। पर डा. मुंडा ने विशेष रूप से कहा कि इतनी क्रिस्प पकौड़ी अरसे बाद खाया है, इससे तो बचपन में मां के हाथों बनी पकौड़ी की याद आ गई। उनके इस रिमार्क ने मन को छू लिया।’’ सच तो है, मां का नाम जोड़कर उन्होंने एक ही वाक्य में कितनी बड़ी बात कह दी थी ? ऐसा ही एक और वाकया सुनाने का लोभ मैं संवरण नहीं कर पा रहा हूं। उनका नाम संगीत नाटक अकादेमी अवार्ड के लिये अनुशंसित किया जाना था जिसके लिए उनका जीवन वृत्त चाहिये था। उनके पास चार-पांच पन्नों का जीवन वृत्त टंकित रूप में उपलब्ध था जो उन्होंने मेरे पास भेज दिया। अकादेमी के प्रपत्र में बहुत सारी सूचनाएं देनी होती हैं जो उन्हें बार बार तंग कर अंततः मैंने प्राप्त किया। जिस दिन यह पुरस्कार घोषित हुआ उन्होंने तुरंत दिल्ली से फोन कर कहा कि आपकी मेहनत सफल हुई। मैंने उन्हें बधाई देते हुए आपत्ति की कि ये मेरी मेहनत नहीं बल्कि आपके गुण और आपकी प्रतिभा की पहचान है जो न जाने ऐसे कई और मौके आपके जीवन में लाएगी। अपने कनिष्ठ सहकर्मियों के लिये ऐसी सोच बिरले लोगों के ही मन में होती है जिनमें से एक थे हमारे प्रिय मुंडा साहब।
डा. मुंडा जैसे व्यक्तित्व के लिए कोई भी विशेषण छोटा पड़ जायेगा। अब ऐसे लोग कहां होते हैं? उनके बारे में एक शेर की दो पंक्तियां याद आती हैंः
न हाथ थाम सके ना पकड़ सके दामन,
बहुत करीब से उठकर चला गया कोई।
लेखक पुराविद हैं। झारखंड के पुरातात्विक स्थलों की खोज में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
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