असीत कुमार
छोटानागपुर में डोरंडा के साथ ही उन दिनों कुछ अन्य मुख्य छावनियां थी। ये थीं हजारीबाग, पुरुलिया, चाईबासा छावनी एवं दूरी पर बिहार की दानापुर छावनी। इन सभी छावनियों में विद्रोह हुए। डोरंडा छावनी जहां रामगढ़ बटालियन तथा 8 लाइट इन्फेंट्री की एक टुकड़ी अवस्थित थी, इसे बहुत बड़ी छावनी माना जाता था। लेकिन पांच छावनियों में तालमेल की कमी, संदेशों का ठीक प्रकार से आदान प्रदान न होना, निर्णयों में देरी इन वीरों के प्रयास को विफल बनाया। समय के परिप्रेक्ष्य में देखें तो दानापुर के कैंट में विद्रोह 25 जुलाई 1857 के दिन, हजारीबाग में 30 जुलाई, डोरंडा स्थित रामगढ़ बटालियन एक अगस्त के दिन, इसके एक दिन बाद 2 अगस्त को पुरुलिया छावनी का विद्रोह और अंत में 30 सितंबर 1857 के दिन चाईबासा छावनी का विद्रोह। इतने कम समय में पांच जगह विद्रोह हुआ।
इन वीरों का प्रयास असफल होने का कारण प्लानिंग की कमी रही या भाग्य का विरुप होना था?आगे देखते हैं। विश्वनाथ शाहदेव, गणपतराय, टिकैत उमरावं सिंह, शेख भिखारी का नाम तो सभी लोग जानते हैं पर शहीद जयमंगल पांडे ,नादिर अली खान, माधव सिंह जैसे वीरों का नाम झारखंड के इतिहास से गायब है। इन्हीं तीनों ने डोरंडा छावनी के सैकड़ों सैनिकों के विद्रोह का नेतृत्व किया था तथा विश्वनाथ शाहदेव को राजा एवं गणपत राय को सेनापति के रूप में चुना था।
डोरंडा विद्रोह का प्रारंभ तब होता है जब डाल्टन ने हजारीबाग के विद्रोह को दबाने के लिए डोरंडा से 300 सैनिकों को लेफ्टिनेंट ग्राहम के नेतृत्व में हजारीबाग की ओर रवाना करवाता है, 30 जुलाई को चलकर यह टुकड़ी ने पहली रात ओरमांझी और दूसरी रात चुटूपालू में काटी एवं एक अगस्त को रामगढ़ पहुंचे। लेकिन यहीं पर जमादार माधव सिंह और सूबेदार नादिर अली के नेतृत्व में सैनिकों ने विद्रोह कर दिया तथा रांची, डोरंडा की ओर लौट चले। इधर इस विद्रोह की खबर पाकर डाल्टन पिठोरिया होकर हजारीबाग की ओर भाग गया।
डोरंडा में रुके बाकी सैनिकों ने भी विद्रोह कर दिया। नेतृत्व सूबेदार जयमंगल पांडे ने संभाला। दो अगस्त को रामगढ़ से विद्रोही सैनिकों का दल भी रांची पहुंच गया। अब सारा कमान जयमंगल पांडे, माधव सिंह और नादिर अली खान के हाथ में था। नीति के अंतर्गत विश्वनाथ शाहदेव को छोटानागपुर के राजा और गणपतराय को सेनापति के रूप में मान्यता दी गई। दो अगस्त को रांची का इलाका एक तरह से स्वतंत्र हो चुका था जो सैनिकों के ग्यारह सितंबर 1857 को रांची छोड़ने तक जारी रहा। शायद कुंवर सिंह की सेना से मिलने यहां के सैनिकों को कुछ पहले ही रांची से निकलने की जरूरत थी मगर यह हो न सका। इसके कारणों बारे में इतिहासकारों को दस्तावेज, बहुत बाद में, अंग्रेजों के कुछ दुर्लभ पत्राचारों के जरिए मिला।
हुआ यूं कि किधर से रांची छोड़ा जाए इस बात को लेकर शीर्ष नेतृत्व में मतांतर हो गया। विश्वनाथ शाहदेव हजारीबाग को ही प्रथम ब्रिटिश शासन मुक्त कराना चाहते थे। वहीं माधव सिंह और गणपत राय कुंवर सिंह के साथ मिलकर साझा शक्ति बनाना चाहते थे। जयमंगल पांडे पहले चाईबासा को मुक्त कराना चाहते थे। इन वार्ताओं में काफी समय बरबाद हो गया। सभी रांची में ही रुके रहे। अंत में गणपत राय और माधव सिंह की बात मानी गई। लेकिन बाबू कुंवर सिंह से मिलने से पहले ही सभी विद्रोही सैनिक मेजर इंग्लिश की टुकड़ी द्वारा चतरा में घेर लिए गए। हमारे सैनिकों की हार हो गई। घायल जयमंगल पांडे और नादिर अली खान पकड़े गए। उन्हें, मार्शल लॉ 1857 एक्ट सत्रह का प्रयोग कर चार अक्टूबर को फांसी चढ़ाया गया। माधव सिंह नहीं पकड़ाए गए। बताया जाता है महीने भर बाद वे कुछ अन्य विद्रोही सैनिकों के साथ पकड़े गए और कई विद्रोहियों के साथ उन्हें भी फांसी हुई। लेकिन तारीख निश्चित नहीं है। दुखद बात है, आज भी शहीद जयमंगल पांडे,नादिर अली खान और माधव सिंह झारखंड के इतिहास में गुमनाम शहीद बन कर रह गए हैं!
अधिवक्ता व लेखक। रांची में रहते हैं। इतिहास में गहरी रुचि।

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