झारखंड की आदिवासी संस्कृति केवल गीत, नृत्य और पर्व-त्योहारों तक सीमित नहीं है। यहां के पारंपरिक आभूषण, हस्तशिल्प और जीवन में उपयोग होने वाली वस्तुएं भी सदियों पुरानी सांस्कृतिक विरासत को अपने भीतर समेटे हुए हैं। डोकरा आभूषण इसी विरासत की एक महत्वपूर्ण कड़ी है।
डोकरा हजारों वर्षों पुरानी धातु ढलाई परंपरा से जुड़ा हस्तशिल्प है। इसमें Lost Wax Casting (लुप्त-मोम ढलाई) तकनीक का प्रयोग होता है। मानव सभ्यता के धातु युग में प्रवेश के साथ विकसित हुई इस पारंपरिक तकनीक का स्वरूप आज भी झारखंड के कुछ गांवों में जीवित है। दुमका और संताल परगना के कुछ क्षेत्रों में ऐसे शिल्पकार आज भी मिलते हैं, जो पीढ़ियों से इस कला को आगे बढ़ा रहे हैं।
SRYEA के निदेशक अमित सिंह बताते हैं कि डोकरा शिल्प का संताल समाज से गहरा संबंध रहा है। पारंपरिक समय में स्थानीय डोकरा कारीगर संताल समुदाय के लिए विभिन्न प्रकार के आभूषण तैयार करते थे। इन्हें स्थानीय रूप से ‘लुडको Jado’ जैसे संबोधनों से भी जाना जाता था।

संताल समाज के पारंपरिक आभूषणों में हासुली, बेजुसाकाम, पगरा, पांजन, साकोम, मुंडाम बेटेरी, तगा, घुंघुर और झुनको जैसे आभूषणों का विशेष महत्व रहा है। ये केवल श्रृंगार की वस्तुएं नहीं, बल्कि सामाजिक पहचान और सांस्कृतिक परंपरा का हिस्सा रहे हैं।
समय के साथ बाजार बदला। डोकरा शिल्पियों ने पारंपरिक आभूषणों के साथ माप-तौल के उपकरण और बाजार की मांग के अनुसार अन्य उपयोगी तथा सजावटी वस्तुएं भी बनानी शुरू कीं। लेकिन मशीन से बड़े पैमाने पर बनने वाले सस्ते उत्पादों के कारण हाथ से काम करने वाले शिल्पकारों के सामने आजीविका का संकट बढ़ा। कई पुराने कारीगर धीरे-धीरे इस पेशे से दूर होकर दैनिक मजदूरी करने को मजबूर हुए।
ऐसे समय में SRYEA ने डोकरा शिल्पकारों के साथ डिजाइन विकास, प्रशिक्षण, उत्पादन और विपणन के क्षेत्र में सहयोग शुरू किया। उद्देश्य रहा कि पारंपरिक तकनीक और सांस्कृतिक पहचान को सुरक्षित रखते हुए डोकरा उत्पादों को आधुनिक बाजार से जोड़ा जाए।
झारखंड डोकरा क्राफ्ट को GI पहचान मिलना इस दिशा में महत्वपूर्ण उपलब्धि है। इससे इस पारंपरिक कला को अपनी भौगोलिक और सांस्कृतिक पहचान के साथ राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय बाजार तक पहुंचाने का अवसर मिला है।
संताल समाज की बड़ी आबादी झारखंड के साथ पश्चिम बंगाल, बिहार और ओडिशा के विभिन्न क्षेत्रों में भी रहती है। इसलिए पारंपरिक संताल आभूषणों से प्रेरित डोकरा ज्वेलरी के लिए बड़ा बाजार मौजूद है। बोलपुर जैसे सांस्कृतिक केंद्रों में युवा पीढ़ी और Gen-Z का पारंपरिक वस्तुओं को आधुनिक फैशन के साथ अपनाना इस कला के लिए नई संभावना पैदा करता है।
अमित सिंह के अनुसार, जरूरत इस बात की है कि परंपरागत डिजाइन को बचाते हुए उसे आधुनिक पहनावे और बाजार की जरूरत के अनुरूप विकसित किया जाए। सरकार, सामाजिक संस्थाओं, डिजाइनरों और बाजार से जुड़े लोगों के संयुक्त प्रयास से डोकरा शिल्प को नई ऊंचाई दी जा सकती है।
डोकरा केवल धातु से बना आभूषण नहीं है। इसमें संताल समाज की स्मृतियां, कारीगरों की पीढ़ियों की मेहनत और झारखंड की आदिवासी पहचान समाहित है।

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