डॉ नितीश प्रियदर्शी, भू विज्ञानी
हिमालय में आई एक अचानक बाढ़ ने फिर याद दिलाया है कि पहाड़ों में होने वाली प्राकृतिक घटनाओं का प्रभाव हजारों किलोमीटर दूर मैदानों तक पहुंच सकता है। 26 अगस्त 2026 को नेपाल-तिब्बत सीमा के निकट आई विनाशकारी बाढ़ इसका एक गंभीर उदाहरण है।
प्रारंभिक आशंका भूकंप या बादल फटने की थी, लेकिन उपलब्ध वैज्ञानिक विश्लेषण के अनुसार इस घटना के पीछे एक बड़े हिमनदीय ढहाव (glacial collapse) की भूमिका रही। हिमनद का एक बड़ा हिस्सा पहाड़ी ढाल से नीचे गिरा और अपने साथ बर्फ, चट्टान तथा भारी मात्रा में मलबा लेकर नदी घाटी में पहुंचा। इसने नदी में अचानक बहुत बड़ी मात्रा में पानी और अवसाद पहुंचा दिया और कुछ ही समय में एक अत्यंत शक्तिशाली flash flood और debris flow उत्पन्न हो गया। लगातार हिमालय में हो रहे भूकंप भी इसका कारण हो सकते हैं। लगातार भूकंप से बहुत बड़े क्षेत्र में दरारें बनती है फिर भूस्खलन होता है खासकर तेज बारिश में। ये भूस्खलन से उत्पन्न अवसाद जल के बहाव में रुकावट पैदा करती है और जब जल का दबाव बढ़ जाता है तो जल तेजी से उस अवरोध को तोड़ते हुए नीचे आती है। जहां पर ये त्रासदी हुई वहां की घटियां भी पतली है जो जल के बहाव में अत्यधिक तेजी ला दी।
आखिर ऐसी बाढ़ क्यों आती है?
हिमालय केवल बर्फ और ऊंचे पहाड़ों का क्षेत्र नहीं है। यह एक अत्यंत सक्रिय भूगर्भीय क्षेत्र है, जहां चट्टानें अभी भी tectonic forces के प्रभाव में हैं। यहां ढाल बहुत तीखी है, घाटियां संकरी हैं और अनेक स्थानों पर हिमनद तथा permafrost मौजूद हैं। जलवायु परिवर्तन इस प्राकृतिक अस्थिरता को और बढ़ा सकता है।
तापमान बढ़ने से हिमनद पीछे हटते हैं और उनका आकार कम होता है। दूसरी ओर, हिमनदों के सामने या उनके ऊपर glacial lakes विकसित हो सकती हैं। इन झीलों की प्राकृतिक मेड़ यदि बर्फ, मलबे या moraine से बनी हो तो वह हमेशा स्थिर नहीं रहती। भूस्खलन, हिमस्खलन, अत्यधिक वर्षा या बर्फ के बड़े हिस्से के गिरने से यह प्राकृतिक बांध टूट सकता है और कुछ ही मिनटों या घंटों में लाखों घनमीटर पानी नीचे की ओर दौड़ सकता है। इसे Glacial Lake Outburst Flood (GLOF) कहते हैं।
लेकिन वर्तमान घटना को केवल GLOF कहना अभी जल्दबाजी होगी। ताजा वैज्ञानिक रिपोर्टों में हिमनद के हिस्से के ढहने और उसके बाद बने विशाल debris flow को प्रमुख कारण बताया गया है।
जलवायु परिवर्तन का कितना संबंध है? यह कहना उचित नहीं होगा कि केवल जलवायु परिवर्तन ने इस एक घटना को पैदा किया। हिमालय में भूस्खलन, हिमस्खलन और हिमनदों का टूटना प्राकृतिक प्रक्रियाएं भी हैं। लेकिन बढ़ता तापमान इन घटनाओं की पृष्ठभूमि को अधिक अस्थिर बना सकता है।
गर्म वातावरण में हिमनद तेजी से पिघलते हैं, बर्फ और चट्टानों के बीच की स्थिरता बदलती है और ऊंचे क्षेत्रों मंत permafrost भी कमजोर हो सकता है। परिणामस्वरूप कुछ पर्वतीय ढाल अधिक अस्थिर हो सकती हैं। वैज्ञानिकों ने हिमालय में ग्लेशियरों के तेजी से पतले होने और पीछे हटने को लेकर लंबे समय से चेतावनी दी है।
इसलिए भविष्य का खतरा केवल "अधिक बाढ़" नहीं है, बल्कि अचानक आने वाली, बहुत तेज और अत्यधिक विनाशकारी flash floods का बढ़ता जोखिम भी है।
इसका बिहार पर क्या प्रभाव पड़ सकता है?
नेपाल और बिहार का संबंध हिमालय से निकलने वाली नदियों के कारण बहुत गहरा है। नेपाल से निकलने वाली या नेपाल से होकर आने वाली गंडक, कोसी, बागमती, कमला और महानंदा जैसी नदियां उत्तर बिहार के मैदानों में प्रवेश करती हैं।
वर्तमान घटना में विशेष चिंता नारायणी–गंडक नदी तंत्र को लेकर है। नेपाल में त्रिशूली नदी आगे चलकर नारायणी नदी तंत्र का हिस्सा बनती है और भारत में यही नदी गंडक के रूप में बिहार की ओर आती है। इसलिए नेपाल में अचानक आई बड़ी बाढ़ का प्रभाव नीचे की ओर नदी के जलस्तर और discharge में दिखाई दे सकता है।
इसी कारण बिहार में गंडक के किनारे के क्षेत्रों को लेकर प्रशासन ने सतर्कता बढ़ाई है।
बिहार में संभावित प्रभाव
1. नदी का जलस्तर अचानक बढ़ सकता है। नेपाल के पहाड़ी क्षेत्र से आया पानी बहुत कम समय में गंडक के प्रवाह को प्रभावित कर सकता है।
2. पश्चिमी चंपारण और आसपास के निचले क्षेत्रों में खतरा बढ़ सकता है। विशेषकर नदी के floodplain में बसे गांवों और कृषि क्षेत्रों पर प्रभाव पड़ सकता है।
3. तटबंधों पर दबाव बढ़ सकता है। अचानक बढ़ता बहाव तटबंधों और नदी किनारे की संरचनाओं पर अतिरिक्त दबाव डाल सकता है।
4. कृषि को नुकसान हो सकता है। उत्तर बिहार की बड़ी आबादी कृषि पर निर्भर है। बाढ़ का पानी खेतों में लंबे समय तक रहने पर खड़ी फसल प्रभावित हो सकती है।
5. मलबा और अवसाद एक बड़ी समस्या बन सकता है। नेपाल की पहाड़ी बाढ़ सामान्य पानी लेकर नहीं आती; वह अपने साथ चट्टान, बालू, बोल्डर और गाद भी ला सकती है। इससे नदी का तल बदल सकता है और आगे चलकर नदी की जलधारण क्षमता प्रभावित हो सकती है।
6. भविष्य में बाढ़ का स्वरूप बदल सकता है। पहले जहां बाढ़ का अनुमान मुख्यतः मानसूनी वर्षा के आधार पर लगाया जाता था, अब हिमालयी क्षेत्र में glacier collapse, GLOF, landslide-dammed lakes और अचानक debris flows को भी ध्यान में रखना होगा।
बिहार के लिए सबसे बड़ी चुनौती
बिहार की समस्या केवल यह नहीं है कि नेपाल में कितनी बारिश हुई। असली प्रश्न यह है कि नेपाल के पहाड़ों में क्या हुआ और उसका पानी कितनी तेजी से बिहार के मैदान तक पहुंचा।
यहां एक महत्वपूर्ण वैज्ञानिक बात समझने की जरूरत है।
हिमालय से निकलने वाली नदियां अपने साथ भारी अवसाद लाती हैं। जब नदी मैदान में पहुंचती है तो उसकी गति कम होती है और अवसाद जमा होने लगता है। इससे नदी का तल धीरे-धीरे ऊपर उठ सकता है और नदी की flood-carrying capacity प्रभावित हो सकती है।
इसलिए बिहार की बाढ़ को केवल "नेपाल की बारिश" या "बांध से छोड़ा गया पानी" कहकर समझना पर्याप्त नहीं है। इसमें भूगोल, भूविज्ञान, नदी-आकृति विज्ञान, sediment transport, मानसून, हिमनद और मानव बसावट सभी जुड़े हुए हैं।

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