◆ बृजलाल, पूर्व डीजीपी, यूपी
शिवपूजन सिंह कुशवाहा नामी-गिरामी पहलवान थे और पेशे से लेखपाल 6 फीट लंबे, गठीले बदन वाले कुशवाहा को बड़ी-बड़ी मूँछें रखने का शौक था। वह ग्राम दरौली थाना जमानियाँ का रहने वाला था। वह था तो लेखपाल, परंतु जमानियाँ तहसील में अपनी दबंगई के लिए कुख्यात था। इलाके में उसे पहलवान के नाम से जाना जाता था। कहा जाता था कि तहसील के अधिकतर गाँवों में शिवपूजन ने जमीन बना ली थी। अपनी दबंगई से उसने ग्राम सभा दरौली की सरकारी जमीनों पर भी कब्जा जमा लिया था।
ग्राम दरौली में ब्राह्मण और कुशवाहा परिवार के लोग रहते थे। शिवपूजन कुशवाहा न केवल अपने गाँव में, बल्कि आसपास के कुशवाहा जाति के लोगों में बहुत प्रभावशाली था। दरौली में ग्राम सभा की जमीन पर ब्राह्मण लोग होलिका रखना चाहते थे, जिसका विरोध लेखपाल शिवपूजन कर रहा था। वह उस जमीन को स्वयं अपने कब्जे में रखना चाहता था। पूर्वांचल में होली के एक महीने पहले से ही लोग लकड़ी, कंडे आदि होलिका में डालना शुरू कर देते हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार जो ईंधन होलिका में पड़ जाता है, उसको कोई नहीं उठाता है। पहले गाँव के शरारती लोग खेतों में बनी झोपड़ी, छप्पर भी होलिका में डालकर जला देते थे। गोबर के उपलों के बिटौरे को भी अक्सर होलिका में डाल दिया जाता था। होली के समय लोग अपने उपलों के बिटौरे की देखभाल करते थे कि कहीं शरारती तत्त्व उसे होलिका में न डाल दें।

दरौली के पांडेय लोगों ने भी विवादित स्थान पर लकड़ी-कंडा डालना शुरू कर दिया था। वे प्रयास कर रहे थे कि एक बार यदि वे वहाँ होलिका जलाने में सफल हो गए तो उन्हें लेखपाल शिवपूजन कुशवाहा कभी हटा नहीं पाएगा। विवादित जमीन पर लकड़ी कंडा देखते ही लेखपाल शिवपूजन कुशवाहा आगबबूला हो गया। कुशवाहा और पांडेय परिवार आमने-सामने आ गए। संख्या बल अधिक होने के कारण शिवपूजन ने पांडेय लोगों को बुरी तरह मारा-पीटा, जिसमें लल्लन पांडेय के पिता अमरदेव पांडेय और कई परिवारजन घायल हो गए। अमरदेव पांडेय मूल रूप से ग्राम पांडेयपुर मेढ़ना थाना धीना जनपद वाराणसी (वर्तमान चंदौली) के रहने वाले थे, जो नवासे पर ग्राम दरौली में आकर बस गए थे। लल्लन पांडेय उस समय पढ़ाई के लिए इंटरमीडिएट कॉलेज गए थे। जब वे शाम को घर आए तो उनकी माँ उनसे लिपटकर रोने लगी और बोली कि देखो शिवपूजन ने तुम्हारे पिता का क्या हाल बनाया है। लल्लन पांडेय था तो 19-20 साल का, परंतु इलाके का उभरता हुआ पहलवान था। वह अपने गुस्से को काबू नहीं कर पाया और झगड़ा करने के लिए शिवपूजन लेखपाल के घर पहुँच गया। शिवपूजन के नेतृत्व में कुशवाहा परिवार के लोगों ने लल्लन पांडेय की भी पिटाई कर दी। लल्लन ने खुद को बहुत अपमानित महसूस किया और उसी दिन अपने पिता के सामने कसम खाई कि वह शिवपूजन कुशवाहा को आने वाली होली नहीं मनाने देगा। लल्लन पांडेय ने अपनी व्यथा साहब सिंह को बताई। सकरारी निवासी साहब सिंह पहलवान था, जिसके यहाँ लल्लन पांडेय का आना-जाना था। मित्रता और एक अखाड़े के पहलवान होने के कारण साहब सिंह ने उसका साथ देने का वादा किया।
वह तारीख थी 7 मार्च, 1974 और दिन था बृहस्पतिवार। उसी दिन होलिका दहन होना था और दूसरे दिन 8 मार्च को होली थी। 7 मार्च, 1974 को शिवपूजन कुशवाहा शाम को जमानियाँ से अपने घर दरौली लौट रहा था। लल्लन पांडेय अपने लोगों के साथ गाँव के पास ही गाड़ा-बंदी करके बैठ गया। जैसे ही शिवपूजन गाँव के बाहर पहुँचा, पहले से घात लगाए बैठे लल्लन पांडेय ने अपने लोगों के साथ शिवपूजन कुशवाहा पर हमला कर दिया। उसने शिवपूजन सिंह कुशवाहा का सिर गँड़ासे से काट दिया और उसके सिर को होलिका में डालकर आग लगा दी। यह एक ऐसी लोमहर्षक हत्या थी, जिससे पूरे इलाके में सनसनी फैल गई और यहीं से गैंगवार की नींव पड़ गई।
शिवपूजन सिंह कुशवाहा की हत्या के संबंध में थाना जमानियाँ पर मु.अ.सं. 49/74 धारा 302 आई.पी.सी. में 7 मार्च, 1974 को पंजीकृत किया गया था। इस होलिका दहन के दिन दरौली गाजीपुर में गैंगवार की शुरुआत मुकदमे में लल्लन पांडेय पुत्र अमरदेव पांडेय, चुन्नू उर्फ चंद्रचूड़ पुत्र परमात्मा पांडेय, सुरेंद्र पांडेय पुत्र चंद्रशेखर पांडेय, रामनाथ पुत्र राम स्वारथ कोइरी सभी निवासीगण दरौली नामित किए गए थे।
मकनू सिंह और साधू सिंह का मृतक शिवपूजन कुशवाहा से प्रगाढ़ संबंध था। हत्या की सूचना मिलते ही अगले दिन साधू सिंह और मकनू सिंह अपने दल-बल के साथ दरौली आ धमके। लल्लन पांडेय और मकनू सिंह गिरोहों के मध्य धुआँधार गोलियाँ चलीं।
शिवपूजन कुशवाहा के मरने के बाद उसके भाई विंध्याचल कुशवाहा ने कुछ लोगों को इकट्ठा करके गैंग बनाया, जो उस समय के कुख्यात डकैत थे। भैंरो राजभर निवासी शाहपुर जमानियाँ, बैरागी पासी आदि उस समय डकैत सरगना देवचंद गैंग के सदस्य थे। देवचंद इतना कुख्यात था कि उसकी गिरफ्तारी के लिए गाजीपुर पुलिस को विशेष दस्ता बनाना पड़ा था। वह कलकत्ता से गिरफ्तार करके कड़ी सुरक्षा में गाजीपुर लाया गया था। कुछ दिन बाद ही वह जेल से बाहर आ गया और डकैतियाँ डालने लगा। वह थाना सैयद राजा वाराणसी (अब चंदौली) में हुई पुलिस मुठभेड़ में मारा गया।
भैंरो राजभर, बैरागी पासी आदि डकैत, विंध्याचल कुशवाहा के पक्ष में दरौली आए और लल्लन पांडेय परिवार पर हमला करना चाहा, परंतु गाँव के लोगों ने इकट्ठे होकर गोलियाँ चलाईं, जिससे गैंग ने वहाँ से भागने में ही अपनी भलाई समझी। कालांतर में लल्लन पांडेय एक ऐसा अपराधी बनकर उभरा, जो भागते हुए भी दोनों हाथों से गोली चलाकर अचूक निशाना साधने में सक्षम था।
गैंगवार में सियाराम यादव खिदिरपुर जमानियाँ, रामदेव मल्लाह आदर्श गाँव कोतवाली गाजीपुर, लोरिक मल्लाह आदर्श गाँव कोतवाली गाजीपुर, राजदेव राय आजमगढ़, अशोक सिंह मेदिनीपुर कोतवाली गाजीपुर, साहब सिंह सकरारी धानापुर, रणजीत सिंह कोतवाली गाजीपुर, वीरेंद्र सिंह बेड़ा और उसका भाई रामबिलास सिंह मुड़ियार सैदपुर गाजीपुर, मकनू सिंह और साधू सिंह निवासी मुड़ियार, छत्रपाल सिंह गाजीपुर, हवलदार राजेंद्र सिंह निवासी मुड़ियार, अनिल सिंह बदरू मुड़ियार आदि गैंगवार की भेंट चढ़ गए।
(डेढ़ बिस्वा जमीन 2024 में प्रभात प्रकाशन, नई दिल्ली से आई थी। पुस्तक का पहला अध्याय है। इसमें बहुत सी क्राइम की फाइल्स हैं। यहां गाजीपुर के दरौली की घटना है, जो आज की पीढ़ी को याद भी नहीं होगी। दरौली मुगलसराय पटना रेल लाइन पर एक छोटा सा हाल्ट है। जमानिया दिलदार नगर के बीच। यह अंश साभार प्रस्तुत है।)

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