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बक्सर : मिथक, स्मृति और ठहरा हुआ शहर
बक्सर ! पश्चिमी बिहार में गंगा के तट पर बसा हुआ एक अलसाया, शांत और सांस्कृतिक शहर; मिथकीय संदर्भों एवं ऐतिहासिक घटनाओं से परिपूर्ण ! कोई जल्दीबाजी नहीं और न ही भविष्य की कोई परवाह !
कहते हैं जब श्रीवामन वेशधारी विष्णु की अवतार भूमि के रूप में यह स्थल भारतीय ज्ञान परम्परा का केंद्र बना था, तब चौरासी हजार सिद्ध ऋषियों का यह सिद्धाश्रम, त्रेतायुग में वामनाश्रम, द्वापर युग में वेदगर्भापुरी होते हुए कालांतर में व्याघ्रसर होते हुए बक्सर कहलाया। उस युग में यह नगर थोड़ी देर के लिए ठहर गया था और अचंभित ऋषियों ने सृष्टि के पालनकर्ता के सामने वैदिक संहिताओं एवं ऋचाओं का पाठ किया था। उसका उस दिन, युग में ठहरना बाद में इस शहर की नियति बन गया।
कई बार लगता है कि रुक-रुककर आगे बढ़ता हुआ यह शहर आज भी कहीं रुका हुआ है। पैदल चलते लोगों से भरी हुई सड़कें, रामरेखा घाट पर गंगा की लहरों के साथ 'हर-हर गंगे' उच्चरित करते लोग: किला के मैदान में पंचकोसी मेला के लिट्टी-चोखा खाते यात्री ब्रिटिश काल में बनी ठहर गए जल में जलभा और गाद फैलाए दोनों सूखी नहरों के पुराने पुलों से गुजरते मुसाफिर; सड़ी हुई मिट्टी यी नालियों से बजबजाता बहता पानी आदि को देखकर लगता है कि वह इस शहर की उपलब्धियों और बेबसी का बयान कर रहे हैं: पर, जब कभी यह उबलता है तो लगता है आज भी महारानी विक्टोरिया का तख्त पलटकर दम लेगा ! मुझे लगता है कि पुराने शहरों का इतिहास जितना आकर्षित करता है, वर्तमान उतनी ही निराशा भी देता है।
कई बार जब आज इस शहर को देखता है तो मंथर गति से चलता हुआ बीच सड़क पर ठहरा हुआ लगता है; बनारस की उस पवित्र गाय की तरह जिस पर कविता लिखते हुए जापानी कवि आरिमा ताकाशी शहर को रुकता हुआ देखते हैं। यह शहर पूरब में ऐतिहासिक पौराणिक गांव सारिमप्र और अहिरौली से घिरा हुआ है तो पश्चिम में चरित्रवन-उनाव से उत्तर में गंगा नदी की धार है तो दक्षिण में आधुनिकता का आगाज़ करता बक्सर जक्शन तथा अब उसे पार करता यह शहर भारतीय इतिहास एवं मिथ की अनंत कहानियां कहता हुआ ठठेरी बाज़ार, बड़की बाजार, नई बाजार, मछरहट्टा पुल यानी मछली बाजार, चुड़िहारी गली, गोला बाजार में विचरने लगता है जहां की स्थानीय रंगत इसे शहरों के इतिहास में अमर कर देती है।
बक्सर का इतिहास : युद्धों से ज्ञान परंपरा तक
लेकिन सबसे पहले ऐतिहासिक घटनाओं के लिए मशहूर इस शहर के कुछ संदर्भ। यह शहर पूरी दुनिया में 1764 ई. के बैटल ऑफ़ बक्सर के कारण जाना जाता है, जब ईस्ट इंडिया कम्पनी के कप्तान हेक्टर मुनरो ने बंगाल के नवाब मीर कासिम, दिल्ली के बादशाह शाह आलम और लखनऊ के नवाब शुजाउद्दौला की संयुक्त सेना को हराकर ईस्ट इंडिया कंपनी के लिए राजस्व वसूली की दीवानी पाई थी।
आज भी बक्सर के कथकौली में अंग्रेजों द्वारा बनाया गया वह विजय स्तंभखड़ा है और उसके ठीक सामने खड़ा है, गांववालों द्वारा बनवाया गया गहरे कुएं में लाशों और हथियारों को दफन कर उस युद्ध में शहीद हुए सैयद अब्दुल गुलाम और अब्दुल कादिर रहमतुल्लाह जैसे दो महान् योद्धाओं के सम्मान में बनाया गया स्मारक जिन्हें भारतीय इतिहास ने कभी याद नहीं किया ! अगर इतिहासकार आधुनिक भारत का इतिहास लिखते हुए इस डोमेन एरिया की यात्रा करते तब उन्हें पता चलता कि आज भी बक्सर को हवाओं और मिट्टी से इस भयानक युद्ध और उसके परिणाम की अनुगूंजे विस्मृत नहीं हुई है। यह स्मारक भारतीय योद्धाओं के हारे हुए युद्ध औ कथकौली के स्वाभिमान की कहानी भी कहता है।
कहते हैं. प्राचीन काल में कभी बक्सर के रास्ते मगध की सेनाएं चौसा के पास गंगा नदी पार करते हए सिकंदर की सेनाओं से लड़ी थी। उसके बहुत संदर्भ तो नहीं मिलते, पर जिस प्रकार अफगान योद्धा शेरशाह सूरी ने 1539 ई. में दूसरे मुगल सम्राट हमायूं को पराजित कियाः उसके किस्से आज भी बक्सर की गलियों और यहां के शशांक शेखर, कंचन कुमार, पंकज कुमार, विमल कुमार आदि जैसे पत्रकारों की रिर्पोटों में कभी-कभी दिखाई दे जाते हैं।
बक्सर के दिवंगत हो चुके इतिहासकार सीताराम उपाध्याय तो बताते थे कि इस क्षेत्र में ईसा पूर्व तीन हजार वर्ष पहले सिंघ घाटी सभ्यता की तरह गंगा नदी के किनारे इस बक्सर क्षेत्र में 'गंगाघाटी सभ्यता' का उदय हुआ था। भारतीय ज्ञान की संहिताओं से लेकर ज्योतिषी शास्त्र की रचना हुई जिसका प्रभाव बलिया से बक्सर तथा बक्सर से बनारस के घाटों तक फैला हुआ था। आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी और आचार्य शिवपूजन सहाय की रचनाओं में बक्सर क्षेत्र के इस प्रभाव को देखा जा सकता है। कोविड के कारण दिवंगत हो चुके कुमार नयन जैसे कवि और संस्कृतिकर्मी, इतिहास की कथा कहते नागेंद्र नाथ ओझा और दीपक कुमार राय जैसे राजनीतिज्ञ और इतिहासकार आज भी इस शहर की चेतना को संयोजित करते रहते हैं।
सिद्धाश्रम से पंचकोशी तक : बक्सर की सांस्कृतिक विरासत
कहते हैं कि जिस शहर का इतिहास जितना पुराना होता है, उसका विस्तार उतना ही अधिक होता है। इस शहर का नाम चौरासी हजार सिद्ध ऋषियों के तप के कारण सिद्धाश्रम पड़ा जिन्होंने एक समय इस शहर और क्षेत्र को भारतीय ज्ञान का केंद्र बना दिया था। बक्सर से जुड़े विश्वामित्र ऋषि और पांच कोसों की दूरी पर अहिरौली के गौतम ऋषि, नादांव के नारद ऋषि, भभुवर के भार्गव ऋषि तथा उन्नाव के उद्दालक ऋषि ने कभी इस शहर को बनाया था तथा राम ने रामरेखा घाट पर ताड़का वध के बाद इन पांच ऋषियों के आश्रमों की यात्राएं की थीं। कहते हैं कि इन पांचों ऋषियों ने राम को क्रमशः लिट्टी-चोखा, कढ़ी-बरी एवं पकवान, मूली-सत्तू, चूड़ा-दही और खिचड़ी खिलाई थी जो आज बिहार के मुख्य भोज्य पदार्थ माने जाते हैं। पंचकोशी यात्रा के दौरान यात्री क्रमशः यही व्यंजन स्वयं पकाते और खाते हैं।
लिट्टी-चोखा से सोनपापड़ी तक : बक्सर का स्वाद
साथ ही, इस मेला में बनी गुड़ की जलेबी इस खान-पान की संस्कृति में चार चांद लगा देती है। और सोन पापडी का कहना ही क्या, आज लोग हल्दीराम की सोनपापडी को जानते हैं. पर उसका उद्म स्थल तो यह शहर बक्सर ही है। आज भी यहां की सोनपापडी का जो स्वाद है. जब आप बक्सर की यात्रा पर जाएंगे, उसे खाए बिना नहीं रह पाएंगे। एक कुटीर उद्योग की तरह लोग आपको सोनपापड़ी बनाते दिख जायेंगे।
इतिहास समृद्ध, वर्तमान बदहाल
जब आप इस शहर में कदम रखेंगे, तब यह बक्सर आज भी उसी रौनक के साथ आपको खड़ा मिल जायेगा। पुराना और धूल उड़ाता जरूर दिखेगा, पर रामरेखा घाट पर गंगा का दर्शन करके आपका मन प्रफुल्लित हो जायेगा। शिक्षा का केंद्र बने महर्षि विश्वामित्र कॉलेज को देखेंगे तो खाकी बाबा की याद हवाओं में गूंजती हुई सुनाई देगी, चरित्रवान प्राचीन काल की नैतिक मर्यादाओं की याद दिलाएगा, बगल में खड़ा त्रिदंडिस्वामी का आश्रम दिखेगा ज्ञान और संस्कृति का प्रसार करता दिखेगा, शहर के चौराहे पर खड़ा ज्योति प्रकाश स्मृति पुस्तकालय युवाओं को अपनी तरफ खींचता दिखेगा और गंगा तट पर बने बक्सर किला की खूबसूरती आपका मन मोह लेगी पर; कभी शुरू हुआ लाइट एंड साउंड का धूलधूसरित पड़ा कार्यक्रम अंतिम सांस लेता दिखेगा। जब शहर पार कर पूरब दिशा में पटना जानेवाली सड़क पर आगे बढ़ेंगे, तब सड़क के दक्षिण ओर खड़ा यहां का बदहाल पड़ा औद्योगिक क्षेत्र आपको अंतिम सांस लेता दिखेगा।
कहने को तो इस शहर ने राजनीति में बड़े-बड़े नेताओं को दिए जिनके लिए प्रचार करने कई प्रधानमंत्री भी आए चाहे वे कांग्रेस के हों या भारतीय जनता पार्टी के पर विकास के लिए सिसकते हुए इस शहर के आंसुओं को कोई नहीं पोंछ पाया । रोजगार और बौद्धिक विकास के लिए पलायन करना इसकी नियति बन चुकी है। यह शहर विकास के लिए आज भी तरस रहा है, भले ही इस शहर की संस्कृति और इतिहास कितना भी समृद्ध क्यों न रहा हो !
यह अंश इतिहास की सरहदें से लिया गया है। प्रकाशन संस्थान, दिल्ली से यह अभी-अभी छपकर आई है। यहां विधाओं का अतिक्रमण दिखेगा। यहां इतिहास भी है, समय भी है, यात्रा, संस्मरण, डायरी-सब कुछ। सरहदें टूटती नजर आती हैं। सवा तीन सौ पेज की इस पुस्तक के लेखक रश्मि चौधरी व देवेंद्र चौबे हैं।

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