राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शताब्दी यात्रा के अवसर पर विश्व संवाद केंद्र, रांची के तत्वावधान में “शतायु संघ और महिला सहभागिता” पुस्तक पर विशेष परिचर्चा कार्यक्रम आयोजित किया गया। कार्यक्रम में राष्ट्र निर्माण, महिला सहभागिता, भारतीय परिवार व्यवस्था, सामाजिक संस्कार तथा महिलाओं की बदलती भूमिका जैसे विषयों पर व्यापक विमर्श हुआ। इस मौके पर राज्यपाल संतोष गंगवार ने कहा कि “शतायु संघ और महिला सहभागिता” केवल एक पुस्तक का विषय नहीं है, बल्कि यह समाज को संघ की भूमिका तथा राष्ट्र निर्माण में महिलाओं के योगदान को समझने का अवसर प्रदान करता है। पुस्तकें केवल शब्दों का संकलन नहीं होतीं। वे किसी कालखंड के अनुभव, विचार और संवेदनाओं को आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाने का माध्यम होती हैं। ऐसे समय में जब डिजिटल माध्यमों के कारण पढ़ने की आदत प्रभावित हो रही है, पुस्तकों का महत्व और बढ़ जाता है।
राज्यपाल ने कहा कि राष्ट्र निर्माण में महिलाओं की भूमिका को केवल परिवार तक सीमित करके नहीं देखा जा सकता। भारतीय समाज में महिला परिवार की आधारशिला होने के साथ-साथ समाज और राष्ट्र के निर्माण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती रही है। आज महिलाएं विज्ञान, शिक्षा, प्रशासन, उद्योग, खेल, सामाजिक सेवा और सार्वजनिक जीवन सहित लगभग हर क्षेत्र में अपनी क्षमता सिद्ध कर रही हैं। उन्होंने कहा कि महिलाओं की सहभागिता केवल संख्या बढ़ाने तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि निर्णय प्रक्रिया में उनकी प्रभावी भूमिका भी सुनिश्चित होनी चाहिए।

लोकतांत्रिक संस्थाओं में महिलाओं की भागीदारी बढ़ना समय की आवश्यकता है। उन्होंने महिला आरक्षण के संवैधानिक प्रावधानों के प्रभावी क्रियान्वयन की आवश्यकता पर भी बल दिया।
गंगवार ने कहा कि पंचायत और स्थानीय निकायों में महिलाओं की सक्रिय भागीदारी ने यह सिद्ध किया है कि महिलाएँ प्रशासनिक जिम्मेदारियों को कुशलता और संवेदनशीलता के साथ निभा सकती हैं। महिलाओं की निर्णय प्रक्रिया में भागीदारी बढ़ने से विकास में संवेदनशीलता और मानवीय दृष्टिकोण जुड़ता है। उन्होंने कहा कि “विकसित भारत 2047” की यात्रा में नारी शक्ति की सक्रिय सहभागिता अनिवार्य है। एक शिक्षित महिला केवल अपने जीवन को दिशा नहीं देती, बल्कि परिवार और आने वाली पीढ़ी को भी प्रभावित करती है। एक आत्मनिर्भर महिला परिवार और समाज में आत्मविश्वास तथा परिवर्तन की चेतना उत्पन्न करती है।
हिंदुत्व को केवल उपासना पद्धति के आधार पर समझना उचित नहीं
विशिष्ट अतिथि एवं नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी ने कहा कि भारतीय समाज और हिंदुत्व को केवल उपासना पद्धति के आधार पर समझना उचित नहीं है। भारतीय दृष्टिकोण इससे कहीं व्यापक है। भारत ने “वसुधैव कुटुम्बकम्” और “सर्वे भवन्तु सुखिनः” की भावना के साथ संपूर्ण मानवता को परिवार के रूप में स्वीकार किया है। उन्होंने कहा कि हिंदुत्व का अर्थ किसी एक पूजा पद्धति या मत को मानना नहीं, बल्कि जीवन को व्यापक दृष्टि से देखने वाली भारतीय विचार परंपरा है। विविधता भारत की शक्ति है और इसी विविधता को स्वीकार करते हुए समाज को साथ लेकर चलना भारतीय संस्कृति की विशेषता रही है। मरांडी ने कहा कि संघ की शताब्दी के अवसर पर समाज के सामने भारतीय विचार और जीवन दृष्टि को स्पष्ट रूप से रखने की आवश्यकता है। उन्होंने “शतायु संघ और महिला सहभागिता” पुस्तक को महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि वे स्वयं पुस्तक का अध्ययन करेंगे और समाज के लोगों से भी इसके अध्ययन का आग्रह करेंगे।
100 महिलाओं से संवाद :
डा. शोभा विजेंद्र ने बताया कि पुस्तक के लिए उन्होंने देशभर की लगभग 100 महिलाओं से संवाद किया और उनके अनुभवों को समझा। इनमें से 34 महिलाओं के अनुभवों को पुस्तक में स्थान दिया गया है। पुस्तक के तीन भागों में व्यक्तिगत अनुभव, संघ के विभिन्न सरसंघचालकों के महिला एवं राष्ट्र निर्माण से जुड़े विचार तथा संघ विचार से जुड़ी महिलाओं के अनुभवों को प्रस्तुत किया गया है। उन्होंने कहा कि महिलाओं की स्वतंत्रता, सम्मान और सहभागिता की अवधारणा भारत के लिए कोई आयातित विचार नहीं है। भारतीय वैदिक एवं सनातन परंपरा में महिला को समाज की शक्ति, संस्कार की वाहक और राष्ट्र निर्माण की महत्वपूर्ण धुरी माना गया है। उन्होंने कहा कि महिला और पुरुष को संघर्ष के रूप में देखने के बजाय भारतीय दृष्टि उन्हें परस्पर पूरक मानती है।
राष्ट्र सेविका समिति की अखिल भारतीय सह कार्यवाहिका सुनीता इंदुलकर, झारखंड प्रांत प्रचारक गोपाल शर्मा , उत्तर पूर्व क्षेत्र के संपर्क प्रमुख अनिल ठाकुर, प्रांत सह संघचालक अशोक श्रीवास्तव तथा प्रभात प्रकाशन के राजेश शर्मा, मनोज नेगी, संजीव सिंह के अलावा डा मयंक मुरारी आदि मौजूद थे।

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