रजीउद्दीन अकील
यह किताब हिंदी में इतिहासलेखन की हमारी कोशिश का एक हिस्सा है। यहां यह दिखाने का प्रयास किया गया है कि नया ऐतिहासिक शोध हिंदी में भी पेश किया जा सकता है। यह एक जरूरी काम है। हिंदी में पठन-पाठन को नीचा दिखाने की कोशिश या किसी तरह की एहसासे-कमतरी सामाजिक भेदभाव की ओर इशारा करती है। इस बुराई या विसंगति को दूर करने की आवश्यकता है। इसके साथ ही नए शोध को विश्वविद्यालयों के विद्वत विमर्श से बाहर निकाल कर सार्वजनिक ज्ञान पटल का हिस्सा भी बनाया जाना चाहिए। शैक्षणिक संस्थानों से जुड़े स्कॉलर्स का यह दायित्व है कि ज्ञान रुपी गंगा को और विस्तृत किया जाए। इस किताब के लेखक का ज्ञान-धर्म में अटूट विश्वास है। किसी भी तरह के सामाजिक पूर्वाग्रह और पक्षपात रहित इस पुस्तक को, जिसका नाम इतिहास-नामा रखा गया है, विद्वत्ता के उत्कृष्ट पैमानों पर परखा जाना चाहिए।
इस पुस्तक में भाषा की राजनीति, मजहब की सियासत और इतिहासलेखन की चुनौतियों समेत कई अहम मुद्दों जैसे भारतीय भाषाओं में साहित्य-सृजन, विशेषकर उर्दू-हिंदी की मुश्तरका या साझी विरासत और सूफी-भक्ति चिंतन के सामाजिक ताने-बाने को एक साथ समझने का प्रयास किया गया है। परिप्रेक्ष्य उत्तर भारत का है और समय-काल तकरीबन 800 वर्षों के बीच की आवाजाही। इतिहासकार ई.एच. कार के शब्दों में भूतकाल और वर्त्तमान के बीच निरंतर संवाद।
हिन्दू-मुस्लिम, मंदिर-मस्जिद, जात-पात, क्षेत्रीयता और संकुचित राष्ट्रवाद की राजनीति में इतिहास का दुरुपयोग न स्वच्छ राजनीति के लिए अच्छा है और न ही ऐतिहासिक ज्ञान की न्यूनतम जरूरत के लिए। पढ़ी-लिखी, समझदार जनता के लिए इतिहास का ज्ञान आवश्यक है। मनुष्य ने प्राचीनतम काल से इतिहास रचा है। मध्यकालीन भारत में इतिहासलेखन की विशाल और जीवंत परम्पराएं देखने को मिलती हैं। यह परम्पराएं संस्कृत और फारसी सहित विभिन्न क्षेत्रीय भाषाओं और नाना प्रकार की शैलियों में पायी जाती हैं। इनका अध्ययन एक सभ्य समाज के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर सकता है। और एक सभ्य समाज का पुनर्निर्माण आज समय की जरुरत है।
ऐतिहासिक रूप से, सांस्कृतिक विविधता हमारे राष्ट्रीय और सभ्यतागत चरित्र का प्रतीक है। दूसरी ओर, सांप्रदायिकता और कट्टरवाद की विनाशकारी खींचतान से समाज बुरी तरह आहत होता रहा है। धर्म के नाम पर की जानेवाली राजनीतिक लामबंदी देश और समाज को हर कालखंड में प्रभावित करती रही है, लेकिन इतिहास गवाह है कि इस तरह की ओछी राजनीति अंततः पूरी तरह डिसक्रेडिट या कलंकित हो जाती है। क्योंकि सांस्कृतिक धरोहरों की नींव काफी मजबूत, समावेशी, और एकीकृत है। रामायण और महाभारत जैसे महाग्रंथों के संस्कृत और देशज भाषाओं में पाए जाने वाले विभिन्न रूपों, आदिग्रन्थ (गुरु ग्रन्थ साहिब) में सम्मिलित संतों और गुरुओं के आध्यात्मिक उपदेश, मलिक मोहम्मद जायसी जैसे सूफी कवियों द्वारा रचित प्रेमाख्यान (पद्मावत), मध्यकालीन इतिहासकारों की संस्कृत, फारसी और देशज भाषाओं में लिखी गयीं ऐतिहासिक कृतियाँ और मुगल दौर की अकबरी विचारधारा का बखान करती अकबरनामा और आईन-ए-अकबरी के अतिरिक्त विभिन्न काल और क्षेत्रों की साहित्यिक रचनाएँ तथा स्थापत्य एवं चित्रकला की अनगिनत मिसालें भारतीय संस्कृति की एक समेकित रुपरेखा पेश करती हैं।
वैचारिक संघर्षों और पहचान की राजनीति में इतिहास का इस्तेमाल एक हथियार के रूप में किया जाता है। धार्मिक राजनीति से जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दों में इतिहास का दुरुपयोग खास तौर से देखने को मिलता है। सार्वजनिक बहसों में उपयोग किए जाने वाले एजेंडा से प्रेरित इतिहास में ऐतिहासिक यथार्थ या सच्चाई के सवाल को ताक पर रखकर लोगों की भावनाओं और समय की आवश्यकताओं पर जोर दिया जाता है। इस तरह की बहसों में, साक्ष्यों और तथ्यों के आधार पर अतीत की घटनाओं के सटीक ज्ञान के बजाय, राजनीति से प्रेरित राय या परिप्रेक्ष्य को थोपने का प्रयास किया जाता है। यह समस्या सार्वजनिक अनुक्षेत्र में परिचालित देशज भाषाई इतिहास के अलावा प्रोफेशनल अकादमिक इतिहास की मान्यताओं में भी देखने को मिलती है। हालांकि दोनों के प्राइमरी फंक्शन्स या प्राथमिक उद्देश्य अलग-अलग हैं, विभिन्न पहलुओं और नजरिए के साथ दोनों इतिहास को राजनीतिक संघर्षों का अखाड़ा बना देते हैं।
साहित्यिक चिंतन और संस्कृति का इतिहास हमें लगातार आईना दिखा रहा होता है। इन ऐतिहासिक परंपराओं की जड़ें काफी मजबूत हैं। यहां की प्राचीन मिट्टी को हम पवित्र भूगोल की संज्ञा देते हैं। इसे गाहे-बगाहे राजनीतिक रूप से दूषित किये जाने के बावजूद, यह अपनी सारी उत्कृष्टता और सृजन शक्ति के साथ कायम रहेगी। यह बात हमें भरोसा दिलाती है कि बड़े विद्वान अपने इर्द-गिर्द के घटिया माहौल से ऊपर उठकर कालजयी या क्लासिक साहित्य की रचना करते हैं। आज भी के हम जिस हाल में हैं, साहित्यकार और इतिहास के विद्वान पठन-पाठन के अपने काम में पूरी जिम्मेदारी और रचनात्मकता के साथ जुटे हुए हैं। भविष्य उज्जवल है।
(रजीउद्दीन अकील, इतिहास-नामा: हिंदुस्तान के पवित्र भूगोल का सांस्कृतिक-ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य, नई दिल्ली: मनोहर, 2025, से साभार। लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग में प्रोफेसर हैं।)
Comments (0)
Write first comment
Please Login to write comment