असीत कुमार
रांची शहर के आसपास के मंदिरों को लें तो प्राचीन मंदिर जिसके निर्माण काल की सही-सही जानकारी मिलती है उनमें से एक बोड़ेया का मदन मोहन मंदिर है जिसका निर्माण 1665 ईस्वी से शुरू हुआ था। इसके 20 वर्ष बाद सन 1685 में बना ,चुटिया का राम मंदिर तथा इसके 6 वर्ष बाद 1691 में बना जगन्नाथ मंदिर है इन तीनों में सबसे पुराना बोड़ेया का मदन मोहन मंदिर ही है।
रांची के सबसे प्राचीन मंदिरों में शामिल है बोड़ेया का मदन मोहन मंदिर
कृष्ण का एक और नाम मदन मोहन है । कृष्ण के कई रूपों में मदन मोहन भी एक रूप है ,अन्य रूपों में धर्मात्मा योगी का रूप जो गीता में दिखाई पड़ता है , दूसरा रूप है धर्म के स्थापना के लिए राजनयिक रूप जो पुराण और महाभारत में मिलता है ,तीसरा रूप ललित, मधुर, मदन मोहन का है इस रूप का वर्णन श्रीमद भागवत,पद्मपुराण और ब्रह्म वैवर्त पुराण में मिलता है । रांची कचहरी से करीब 8 किलोमीटर पर बोड़ेया का मदन मोहन मंदिर अवस्थित है । यह मंदिर प्राचीन समय के उत्कृष्ट कारीगरी को बताता है । मंदिर ग्रेनाइट पत्थर से बनाया गया है हालांकि बाद के दिनों में सजावट हेतु इसके कुछ एक दीवारों पर प्लास्टर चढ़ाया गया है मंदिर में कुछ 12 स्तंभों का प्रयोग हुआ है जिसके दो स्तंभ बाद में बनाए हुए हैं मध्य भाग में तीन स्तंभों से घिरा गर्भगृह है जहां मदन मोहन स्वामी, राधा रानी के साथ विराजते हैं इस मंदिर के निर्माण का प्रारंभ 1665 ईस्वी में रघुनाथ शाह के शासनकाल में लक्ष्मी नारायण तिवारी द्वारा किया गया था। युवा वंशज आकाश नारायण तिवारी के अनुसार आज भी लक्ष्मी नारायण तिवारी के वंशजों के द्वारा ही मंदिर की देखरेख की जाती है। मंदिर किसी भी मठ द्वारा संचालित नहीं है किंतु यह वृंदावन परंपरा का पालन करती है। पुजारी बालमुकुंद पांडे तथा मुरारी पांडे उसी परंपरा का पालन करते हैं । मदन मोहन मंदिर के इतिहास की बात करें तो यहां दो शिलापट्ट प्राप्त हुए थे जो मंदिर के प्रवेश करते समय दाहिने बाजू में चारदिवारी पर लगाए गए हैं ।जो करीब चार सौ साल पहले की देवनागरी लिपि और प्रोटो बांग्ला लिपि का मिलाजुला रूप में है। इनमें एक शिलापट्ट जो आकृति में छोटी है उसमें निम्नलिखित पंक्तियां उत्कीर्ण है "श्री राम राज्य संवत सत्रह सइ बाइस बैशाख सुदि दशमी रजनीश श्री रघुनाथ नरेश बिराज श्री लक्ष्मी नारायण ईश्वर मठसाज" दूसरे शिलालेख को पूरा पढ़ा नहीं जा सका है। इसके अनुसार "संवत१७२२ समय बैशाख सुदि दशमी... श्री श्री मदन मोहन मंदिर ...... १७२५ संवत सावन सुदि दशमी....बाजा १७३५ संवत रुपया १४००१"।
सुधा सिन्हा सहित कई अनुसंधानकर्ताओं की पुस्तक में इसका उल्लेख है । वहीं दूसरी ओर मंदिर द्वारा जारी डॉ राम कुमार तिवारी द्वारा लिखित पुस्तक में दूसरे शिलालेख का पूरा अनुवाद सहित डाला गया है । राजा द्वारा दिया गया एक ताम्रपत्र भी तिवारी परिवार में उपलब्ध है। इसमें विस्तार से बोड़ेया ग्राम की वृत्ति (भरण पोषण हेतु धन )को लक्ष्मी नारायण तिवारी को प्रदान किया गया है यानी एक तरह से इस मंदिर का इतिहास काफी कुछ संरक्षित है। कुल मिलाकर समयक्रम इस तरह से बनता है ।
1665 में रखी गई थी मंदिर की नींव
मंदिर की नींव 1665 ईस्वी में रखी गई तथा चारदीवारी का निर्माण सन 1668 में पूरा हुआ तथा मंदिर का कुल निर्माण 1672 में पूर्ण हुआ। इसके निर्माण में ₹14001(उस समय ) की लागत आई थी।इस मन्दिर को 'श्री' मदन मोहन मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। प्राप्त जानकारी के अनुसार भारत में राधा कृष्ण मंदिर तो अनेक हैं लेकिन मदन मोहन मंदिर कुल पांच ही हैं। जिसमें बोड़ेया (झारखंड) सहित पश्चिम बंगाल में मेलोक ,सामल के निकट, विष्णुपुर बांकुड़ा में, कुचबिहार में तथा वृंदावन(मथुरा) में महाराजा ब्रजनाभ द्वारा स्थापित मंदिर। भारत के बाहर बोड़ेया के मदन मोहन मंदिर की जानकारी बहुत कम लोगों को ही है ।इसअभिनव मंदिर को एक धार्मिक स्थल तथा पर्यटन केंद्र के रूप में विकसित किया जाना चाहिए।

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