किशोरीलाल मेहता
अक्तूबर सन् 1944 की बात है । ऊंचे-ऊंचे पर्वतों के बीच सुदूर पूर्व के सैनिक स्थानों में गांधी-जयंती मनायी जा रही थी । अंडमान, सिंगापुर, श्यामदेश और हिन्द-चीन, सभी जगह आज़ाद हिन्द फौज के पड़ावों में गांधी-जयंती की तैयारियां की गयीं थीं । अपना खून देकर आजादी लेने वाले दीवानों ने अहिंसा के देवदूत के चरणों में पुष्प चढ़ाए। पूर्वी एशिया पर मंडराने वाले हवाई जहाजों ने आश्चर्य से देखा कि घने जंगलों में, सूनी घाटियों में, घने नगरों में, सभी जगह तिरंगा झण्डा लहरा रहा है । नवजवान झंडों को सलामी दे रहे हैं । राजधानी में आज़ाद भारत सरकार की तरफ से सुभाष चंद्र की अध्यक्षता में गांधी जयंती मनायी जा रही है । सूर्य निकालने से पहले “झांसी रानी” रेजिमेंट की महिलाएं शुभ्र-वस्त्र धारण कर, वेणी में तिरंगे फूल खोंस कर प्रभात-फेरी में वंदना-गीत गाती निकलीं। सैनिक अपनी पोशाकों में तिरंगे बैज लगाए, हाथों में बंदूक लिए निकले।
तिरंगे झंडे वाली मोटर से सुभाष बाबू बाहर निकले। लेफ्टिनेंट हबीबुर्रहमान ने पास आकर सैल्यूट किया । सैनिकों ने इंकलाब-जिन्दाबाद का नारा लगाया। झांसी-रानी की प्रधान कुमारी लक्ष्मी ने सैल्यूट दिया । एक सहायक महिला ने डोर पर चढ़ा हुआ एक रेशमी तिरंगा झण्डा कुमारी लक्ष्मी को दिया । वह डोर खंबे में लगायी गयी । उसके बाद ‘सावधान’ की एक कड़कती आवाज मैदान में गूंज उठा और सैनिकों की निगाहें झंडे की तरफ उठ गयीं । सुभाष आगे बढ़े और उन्होंने डोरी खींच ली । तिरंगा हवा में लहराने लगा।
हजारों सैनिकों के कंठ से रण-संगीत गूंज उठा-- “कौमी निशां लहराए जा”!
सायंकाल एक विशाल सभा हुई । मंच पर चांदी के फ्रेम में गढ़ा महात्मा गांधी का बहुत बड़ा चित्र रखा गया था । उस पर एक माला पड़ी हुई थी । मंच की दायीं ओर विदेशी राज्यों के प्रतिनिधियों के बैठने का प्रबंध था, बायीं ओर बौद्ध महंतों का स्थान था । बौद्ध महंतों की प्रार्थना तथा कुरान-पाठ के बाद नेताजी का भाषण प्रारंभ हुआ । “गांधी जी मेरे गुरु हैं । मैं अपने गुरु को प्रणाम करता हूं। इस क्षितिज के पार, बल खाती नदियां, लहराते जंगलों के पार, स्वर्ण-भूमि है, हमारे सपनों का देश । वह देश संसार का सबसे सुंदर देश भारत है ।
....गांधी, जिनकी जयंती हम मना रहे हैं, आधुनिक ऋषि हैं । उनकी अहिंसा ही मानवता की एकमात्र आशा है, लेकिन गुलाम देश की अहिंसा अहिंसा नहीं, कमजोरी होती है । इसलिए हम पहले अपने भारत को आज़ाद करेंगे । हमें मौत की मंजिलें पार करते हुए दिल्ली पहुंचना है । जिस दिन दिल्ली के लाल किले पर तिरंगा झण्डा लहराएगा, उस दिन मणि-जटित सिंहासन पर हम महात्मा को बिठाएंगे, गंगाजल से उनके चरण धुलाएंगे और उनसे कहेंगे कि अब आप संसार का नेतृत्व अपने हाथ में लीजिए । आपकी अहिंसा की जरूरत अब है, मेरे गुरुदेव। ”
(‘रविवार’, 2-8 अक्तूबर 1977)
यह लेख
कर्नल उपाध्याय रथि राज ने उपलब्ध्य कराया है वे स्वतंत्रता सेनानी रामरक्ष उपाध्याय के पौत्र हैं और रांची में रहते हैं।
Comments (0)
Write first comment
Please Login to write comment