भारतीय टीम ने इस स्पर्धा में कुल 1898.0 अंक हासिल कर रजत पदक जीता। टीम में सोनम मस्कर ने 634.1 अंक हासिल किए और क्वालिफिकेशन राउंड में तीसरे स्थान पर रहीं। उनकी साथी एलावेनिल वलारिवन ने 633.5 अंक के साथ सातवां स्थान हासिल किया, जबकि विदर्सा कोचालुमकाल विनोद ने 630.4 अंक अर्जित किए। सोनम की इस सफलता के पीछे उनके परिवार का लंबा और संघर्षपूर्ण सफर है।
कोरोना में ठप हुआ कारोबार, गांव लौटना पड़ा
मस्कर परिवार कई साल पहले कारोबार के सिलसिले में मुंबई जाकर बस गया था। वहां बच्चों की पढ़ाई अच्छी चल रही थी, लेकिन कोरोना महामारी ने परिवार की पूरी स्थिति बदल दी। लॉकडाउन के दौरान पिता उत्तम मस्कर का कारोबार ठप हो गया और परिवार को मुंबई छोड़कर कोल्हापुर स्थित अपने गांव लौटना पड़ा।
गांव लौटने के बाद परिवार के सामने आर्थिक संकट और गहरा गया। आजीविका के लिए इस्तेमाल होने वाला एक टैंकर बेचना पड़ा। इसके बाद अगले दो-तीन वर्षों में मुश्किलें बढ़ती गईं और परिवार को अपना दूसरा टैंकर भी बेचना पड़ा।
बच्चों की पढ़ाई और सोनम की निशानेबाजी से जुड़े महंगे उपकरणों में कोई कमी न आए, इसके लिए परिवार ने अपनी साढ़े 10 गुंठे जमीन और गडहिंग्लज स्थित दुकान तक बेच दी। माता-पिता ने आर्थिक परेशानियां झेलीं, लेकिन उन्होंने बच्चों के सपनों पर इसका असर नहीं पड़ने दिया।
11वीं में चुनी निशानेबाजी, दो महीने में स्टेट लेवल पर पहुंचीं
सोनम के पिता उत्तम मस्कर ने आईएएनएस को बताया कि उनकी बेटी ने 11वीं कक्षा में राइफल शूटिंग को चुना था। उन्होंने कहा, “इस खेल में काफी खर्च होता है। सोनम ने अपनी मां से बात की और शुरुआत की। शुरुआती दो महीनों में ही उसने राज्यस्तरीय प्रतियोगिता में हिस्सा लिया। इसके बाद उसकी इस खेल में रुचि और बढ़ गई।”
उत्तम मस्कर ने बताया कि उन्होंने शुरुआत में सोनम से कहा था कि 12वीं की परीक्षा के बाद ही वह निशानेबाजी को आगे जारी रख पाएंगी। उन्होंने कहा, “लॉकडाउन के दौरान मेरा कारोबार पूरी तरह ठप हो गया, जिसके बाद हमें गांव लौटना पड़ा। लॉकडाउन के बाद कोल्हापुर की वेद एकेडमी में राधिका मैडम और रोहित सर के मार्गदर्शन में सोनम की बुनियाद मजबूत हुई। इसके बाद उसका चयन एनसीओई के लिए हुआ और अब वह दिल्ली में प्रशिक्षण ले रही है।”
मां बोलीं- बेटी से दूर रहना भावुक कर देता है
सोनम की मां सुमन ने कहा कि बेटी की उपलब्धि पर पूरा परिवार गर्व महसूस कर रहा है। उन्होंने बताया कि सोनम परिवार से दूर रहती हैं और कई बार उन्हें घर की याद आती है।
उन्होंने कहा, “बेटी से दूर रहना कभी-कभी भावुक कर देता है, लेकिन देश के लिए खेलना है तो यह सब करना पड़ता है। वह अभ्यास के दौरान पांच से छह घंटे तक खड़ी रहती है। भारी राइफल और शूटिंग की पोशाक के साथ वह कड़ी मेहनत करती है। अगर स्कोर अच्छा नहीं आता है तो वह शाम को दोबारा अभ्यास करने चली जाती है।”
बहन को भरोसा- ओलंपिक में भी जीतेगी गोल्ड
सोनम की बहन मानसी ने कहा कि परिवार को उसकी उपलब्धि पर गर्व है। उन्होंने कहा, “सोनम ने जितना संघर्ष और मेहनत की है, उसे देखते हुए एशियन गेम्स में सिल्वर मेडल जीतना बड़ी उपलब्धि है।”
मानसी ने बताया कि भारी राइफल उठाने के कारण सोनम को कभी-कभी कंधे में दर्द भी होता है, लेकिन वह अपनी मेहनत जारी रखती हैं। उन्होंने कहा, “उसे देखकर पूरा भरोसा है कि वह ओलंपिक में भी देश के लिए गोल्ड मेडल जीतेगी।”
सोनम के भाई ने बताया कि भाई-बहनों के बीच सामान्य तौर पर हंसी-मजाक होता रहता है, लेकिन सोनम के व्यस्त कार्यक्रम के कारण रोजाना पांच-दस मिनट ही बातचीत हो पाती है। उन्होंने कहा कि बातचीत के दौरान अक्सर ओलंपिक में देश के लिए स्वर्ण पदक जीतने के सोनम के लक्ष्य पर चर्चा होती है।
सोनम का अगला लक्ष्य- 2028 ओलंपिक में गोल्ड
परिवार के त्याग और अपनी वर्षों की मेहनत को सोनम ने अपनी उपलब्धि में बदल दिया। एशियन गेम्स में रजत पदक जीतने के बाद उन्होंने अपना अगला लक्ष्य भी स्पष्ट कर दिया है।
सोनम ने कहा, “2028 के ओलंपिक खेलों में भारत के लिए स्वर्ण पदक जीतना ही मेरा मुख्य लक्ष्य है। इसके लिए मैं अभी से कड़ी मेहनत और तैयारी कर रही हूं।”

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