◆ संजय कृष्ण
गोंय। गोवा के पुराने एयरपोर्ट से बाहर आते ही इस शब्द ने चौंकाया। एक विशाल नीले रंग के बोर्ड पर लिखा था-गोंय विमानतलकार तुमचे स्वागत आसा। नीचे हिंदी व अंग्रेजी में लिखा था-गोवा हवाई अड्डे पर आपका स्वागत है। गोंय कोंकणी शब्द है। मराठी और हिंदी में गोवा। गोवा की यह पहली यात्रा थी और पहली बार इस शब्द से परिचय हुआ। रात के साढ़े दस बज रहे थे। यहां से बागा बीच के पास जाना था-ठहरने की यहीं व्यवस्था थी। करीब साठ किमी की दूरी तय कर आधी रात होटल पहुंचे। रांची से मौसम एकदम अलहदा था। होटल की औपचारिकता पूरी करते-करते रात के दो बजे गए। होटल का स्वीमिंग पुल शांत हो चुका था। रोशनी की परछाइयां नीले पानी में झिलमिला रही थीं। पुल के भीतर से भी रोशनी छन-छनकर सतह पर आ रही थी। थकान के बावजूद मन में उत्साह था। सुबह के इंतजार में थकी-मांदी आंखें नींद के आगोश में समा गईं।
गोंय ने सपने को घेर लिया था।
गोवा। एक जाना-पहचाना नाम, लेकिन परिचय अब हो रहा था। सुबह नाश्ता करने के बाद चल पड़े अपने गंतव्य की ओर। साफ-सुथरी सड़क-हरा-भरा नगर। हर घर हरियाली से परिपूर्ण। फरवरी का पहला सप्ताह बीत गया था। दूसरा शुरू हुआ था और गर्मी के तेवर दिखने लगे थे। गोवा में घूमने के लिए नवंबर से फरवरी सबसे मुफीद समय माना जाता है। वेलेंटाइन डे पर गोवा में रस कुछ ज्यादा ही हो जाता है। पत्रा सूचना कार्यालय, रांची के मीडिया एंड कम्युनिकेशन आफिसर राजेश सिन्हाजी ने गोवा के भूगोल और स्थापत्य से परिचय कराया... गोवा देश का सबसे छोटा राज्य है। जनसंख्या भी महज 15 लाख के आसपास। यानी अपनी रांची के बराबर। अरब सागर की लहरें गोवा की पांव पखारती हैं। स्थापत्य का कहना ही क्या? इस छोटे से भूखंड पर पुर्तगालियों ने 450 सालों तक शासन किया। यह तो लोहिया थे, जिनकी बदौलत आजादी ने अंगड़ाई ली और भारतीय सैनिकों ने 19 दिसंबर 1961 को इसे अपने देश का अंग बना दिया।

कहते हैं, गोवा का आधुनिक इतिहास पांच शताब्दी पुराना है। इतिहास की पोथियां बताती हैं कि यहां गोप यानी अहिरों की आबादी थी। अपने झारखंड में भी गोप टाइटलधारी खूब मिलते हैं। महाभारत में गोपराष्ट्र कहा गया है। दक्षिण कोंकण क्षेत्रा का उल्लेख गोवाराष्ट्र के रूप में मिलता है। संस्कृत के कुछ अन्य पुराने स्रोतों में गोवा को गोपकपुरी और गोपकपट्टन कहा गया है। गोवे, गोवापुरी, गोपकापाटन और गोमंत...न जाने कितने नाम। गोकर्ण नामधारी भी गोवा को ही अपना मूल स्थान बताते हैं। एक कथा यह भी है कि जिस स्थान का नाम पुर्तगाल के यात्रियों ने गोवा रखा वह आज का छोटा सा समुद्र तटीय शहर गोअ-वेल्हा है। बाद में उस पूरे क्षेत्रा को गोवा कहा जाने लगा, जिस पर पुर्तगालियों ने कब्जा कर लिया। यह कोंकण क्षेत्रा का हिस्सा भी है और जिसका विस्तार गुजरात से केरल तक बताया जाता है। और, इस पूरे क्षेत्रा की रचना भगवान परशुराम ने की थी। यहां भगवान परशुराम की प्रतिमा भी स्थापित है। वैसे, नासिक में भी भगवान परशुराम का एक मंदिर मिलता है। यूपी के गाजीपुर के जमानियां में भी भगवान परशुराम का मंदिर है। जमानियां को जमदग्नि का क्षेत्रा कहा गया है। झारखंड के गुमला जिले में टांगीनाथ धाम है, जहां हजारों साल से खुले में लोहे का त्रिशूल गड़ा है। इसे परशुराम का फरसा भी कहा जाता है। साधु-संत ऋषि तो बहते नीर की तरह होते हैं। कहीं एक ठिकाना तो होता नहीं। गोवा, ज्ञात इतिहास से भी पुराना है। गोवा के समुद्र में हाथियों के दांत मिले हैं।
छोटे से लगभग तीन जिलों वो इस तटीय प्रदेश ने दुनिया को अपनी ओर खिंचा है। हर साल 80 लाख पर्यटक यहां आते हैं। पर्यटन इसकी अर्थव्यवस्था का एक प्रमुख स्रोत कह सकते हैं। इसकी खूबसूरती और कहीं-कहीं ठेठ गांव जैसा दृश्य लुभाता है, डराता नहीं।पर, गोवा वही नहीं है, जिसकी छवि हमारे मन में बसती है। बांबे टू गोवा जैसी फिल्मों ने भी गोवा की छवि बनाई है, लेकिन हमारा जिस गोवा से परिचय हुआ, उसके बारे में कम लोग ही जानते हैं। गोवा बदलती दुनिया का अध्ययन करता है। बदलते पर्यावरण, समुद्र की रहस्यमयी दुनिया, दुनिया के दो ध्रुव भी इसके अध्ययन में शामिल हैं।
सवाल पूछने की आदत...
विज्ञान हमारे लिए क्यों जरूरी है? विज्ञान कितना महत्वपूर्ण है? जागरूकता, जिज्ञासा और सवाल पूछने की आदत क्यों नहीं होनी चाहिए? राष्ट्रीय ध्रुवीय और महासागरीय अनुसंधान केंद्र (एनसीपीओआर) के मुखिया डा राहुल मोहन बताते हैं कि विज्ञान से ही समाज आगे बढ़ सकता है। और, विज्ञान सदैव संदेह और विचार करना सिखाता है। हर चीज को लेकर हमारे भीतर संशय होना चाहिए। संशय से ही सवाल जन्म लेते हैं। सवाल से चिंतन और फिर समाधान की राह। गोवा जैसे छोटे राज्य में भारत सरकार का यह बड़ा केंद्र है। हरा-भरा परिवेश और थोड़ी दूर पर समुद्र। हमारे लिए धरती भी एक रहस्य है। समुद्र भी और ब्रह्मांड भी। देश दुनिया बदलते मौसम को देख रही है। ऋतु चक्र के परिवर्तन को हम महसूस कर रहे हैं। यह सब क्यों हो रहा है, कैसे घटित हो रहा है, एनसीपीओआर इस पर अपनी नजर बनाए हुएलीरन है। मूलतः बनारस के रहने वाले डा राहुल इस संस्था के काम के बारे में बताते हैं। भारत सरकार के पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय (एमओईएस) के अधीन एनसीपीओआर सभी भारतीय ध्रुवीय और दक्षिणी महासागरीय वैज्ञानिक गतिविधियों के लिए नोडल एजेंसी के रूप में कार्य करता है। काम व्यापक है और बेहद कठिन भी। बंजर भूमि पर बने लगभग 148,000 वर्ग मीटर में फैले इस संस्थान में आर्कटिक व अंटार्कटिका अध्ययन करना है। हमारी धरती क्यों गर्म हो रही है, अंटार्कटिका का बर्फ क्यों पिघल रहा है, इस बार बारीक नजर यह संस्थान रखता है।
अंटार्कटिका में यह मैत्राी नाम से 1989 से कार्यरत है और अब भारती 2012 में शुरू किया गया- नामक स्थायी अनुसंधान केंद्रों का रखरखाव करता है। आर्कटिक क्षेत्रा में, भारत की स्थायी अनुसंधान उपस्थिति नार्वे के स्वालबार्ड प्रांत के न्या-आलेसुंड में स्थित हिमाद्री स्टेशन के माध्यम से स्थापित है, जिसकी स्थापना 2008 में हुई थी। यह स्टेशन जलवायु परिवर्तनशीलता, समुद्री बर्फ की निगरानी और ध्रुवीय वायुमंडलीय विज्ञान पर वर्ष भर अध्ययन करता है। लाहौल स्पीती में हिमांश के माध्यम से हिमालय का अध्ययन किया जाता है। इन स्थानों पर रहना बहुत कठिन है। बर्फ की मोटी चादर में लिपटी इस धरती पर सांस लेना भी मुश्किल होता है। हर पाल जान पर संकट फिर भी शोध-अनुसंधान का जज्बा। लेकिन हम अपनी धरती के लिए क्या कर रहे हैं? पेड़ों को काट रहे हैं। जंगल को साफ कर रहे हैं। नदियों को प्रदूश्षित कर रहे हैं। हर कदम हम खुद से अपनी मौत की ओर खुशी-खुशी विकास के नाम पर कदम बढ़ा रहे हैं। हम अजब प्राणी हैं, जिस डाल पर बैठे हैं, उसे ही काट रहे हैं। हमारे कारनामों से समुद्र की सतह उ$ंची हो रही है। बर्फ धीरे-धीरे टूट-बिखर रहे हैं। धरती व मनुष्य सबके लिए संकट का सबब है। धरती गर्म होगी तो बर्फ पिघलेगा ही। यहां आकर यह महसूस हुआ कि हम सब जिस अंधाधुंध विकास की ओर अंधा होकर भाग रहे हैं, वह दरअसल मृगमरीचिका है। इक्कीसवी सदी का एक चौथाई खत्म हो गया और इस सदी की पहली पीढ़ी ने शायद ही कभी ‘‘सामान्य’’ जलवायु का अनुभव किया हो।
गोवा की हरियाली देखता हूं तो मन को सुकून मिलता है। हमने इस तरह का कोई शहर नहीं देखा। ताड़ के वृक्षों और नाना प्रकार के पेड़-पौधों-लताओं से भरे घर-मकान और सड़कें सत्राहवीं सदी के एक यात्राी के कथन की याद दिलाती हैं। उसने लिखा है-‘यह संपूर्ण भूमि (तब पुतर्गाली यहां आबाद हो गए थे।) विलाओं और सैरगाहों से सघन रूप से आच्छादित है और विशेष रूप से नदियों के किनारे रमणीय उद्यानों और ताड़ के पेड़ां से घिरे घरों और अन्य इमारतों से सुशोभित हैं।’’
सड़क के दोनों ओर हम इमारतों की बनावट को देख रहे थे। कहीं-कहीं छोटे चर्च तो किसी के घर के सामने क्रास बना हुआ। ईसाइयत का प्रभाव जहां-तहां दिख रहा था, लेकिन प्रकृति अलहदा थी। गोवा शिपयार्ड पहुंचे तो एक अलग ही दुनिया से साक्षात्कार हुआ। यह गोवा के वास्को द गामा नगर में स्थित है। इस नगर की स्थापना 1543 में की गई थी। वास्को द गामा एक पुर्तगाली यायावर था और उसके आने के बाद 1510 में पुर्तगालियों ने गोवा को विजित कर लिया। क्या पता था कि यह गुलामी पांच शताब्दी लंबी चलने वाली थी?
और, जब पुर्तगालियों ने एक बार पैर जमा लिए तो क्या वे इस खूबसूरत तटीय क्षेत्र को इतनी आसानी से छोड़ सकते हैं, जिसके बारे में सुत संहिता लिखता है, ‘‘गोकर्ण के उत्तर में सात योजन (1 योजन लगभग 19.2 किलोमीटर के बराबर होता है) की परिधि वाला क्षेत्रा है, इसमें गोवपुरी स्थित है, जो सभी पापों का नाश करती है। गोवपुरी के दर्शन मात्रा से पिछले जन्म में किए गए पाप नष्ट हो जाते हैं, जैसे सूर्योदय के समय अंधकार छंट जाता है... निःसंदेह गोवपुरी के समान कोई क्षेत्रा नहीं है।’’
किसी ने लिखा है, ‘‘गोवा वह जगह है जहां बीते हुए कल को भुला दिया जाता है और आने वाले कल को भुला दिया जाता है, और जीवन, प्रेम की तरह, एक मासूम सपना है, बिना सोचे-समझे और अप्रत्याशित। लेकिन खूबसूरत।’’
गोवा शिपयार्ड लिमिटेड...
गोवा निस्संदेह खूबसूरत है। इस खूबसूरती को निहारते हुए हम गोवा शिपयार्ड लिमिटेड (जीएसएल) पहुंच गए। इसकी कहानी अलहदा है। दोपहर बाद यहां पहुंचे थे। एक विशाल कमरा म्यूजियम की तरह था, जहां हमें पोत के इतिहास के बारे में बताया गया। छोटे-छोटे जहाजों के माडल रखे हुए थे। शिपयार्ड का इतिहास भी था और कुछ पुरानी तस्वीरों में झांकता इसका अतीत। पीआरओ ने बताया, जीएसएल सार्वजनिक क्षेत्रा की रक्षा पोत निर्माण कंपनी है। पुर्तगाली प्रशासन ने 1957 में स्थापित किया था। तब यह देश का हिस्सा नहीं बना था। पहले यह शिपयार्ड मूल रूप से खनन क्षेत्रा के लिए बजरा बनाता था। 1961 में गोवा के भारत में विलय के बाद जीएसएल भारतीय नौसेना और भारतीय तटरक्षक बल के लिए युद्धपोत और समुद्री रक्षा पोत बनाने लगा। कंपनी बजरा, टग, लैंडिंग क्राफ्ट, तटीय गश्ती पोत और निर्यात जहाजों सहित 167 पोत बना चुकी है। यहां आकर एक अलग गोवा से परिचय होता है और जो आत्मनिर्भर भारत की दिशा में कार्यरत है। देश ही नहीं, दूसरे देशों के लिए भी अब यह कंपनी निर्माण करती है। यहां जानने को बहुत कुछ था। फोटो की मनाही थी, लेकिन जो आंखों ने देखा, उससे एक नए भारत की शक्ति का एहसास हुआ। कुछ संस्थाएं चुपचाप बिना शोर काम करती हैं। जीएसएल उनमें से एक है। हमने देखा, विशाल पोत कैसे बनते है। नौ सेना की जरूरतों के मुताबिक यहां जहाज कैसे बनते हैं! विशाल लोहे की मोटी चादरों से जहाज आकार लेता है। यहां के अधिकारी ने बताया, जीएसएल आंध्र प्रदेश में एक नए जहाज निर्माण संयंत्रा में 1,500 करोड़ का निवेश करने जा रही है। यह शिपयार्ड का गोवा के बाहर पहला बड़ा विस्तार होगा, जिससे पश्चिमी तट पर मानसून की बाधाओं से अप्रभावित रहते हुए पूरे वर्ष जहाज निर्माण संभव होगा और दक्षिण पूर्व एशिया में जहाज निर्यात मार्गों तक रणनीतिक पहुंच प्राप्त होगी। वैसे, यहां आम आदमी की पहुंच नहीं है। हमारी पहुंच को पीआईबी ने सुलभ बनाया। हम देख सके कि देश के निर्माण में यह किस प्रकार अपनी भूमिका निभा रहा है। गोवा की जो जनमानस में छवि बनी है, उससे इतर एक अलग गोवा से हम मुखातिब थे।
मोरमुगाओ बंदरगाह...
छोटा सा यह शहर, या कहें, राज्य बार-बार चकित कर रहा था। एक ऐसा ही बंदरगाह मोरमुगाओ ने हमें चकित किया। जब उड़न खटोले नहीं थे, तब समुद्री मार्ग व्यापार-खोज-यात्रा के लिए एक प्रमुख साधन हुआ करता था। हालांकि समुद्री मार्ग आज भी हमारी जरूरत बना हुआ है। यूरोपीय इसी मार्ग से हमारे देश पहुंचे थे। गोवा का यह बंदरगाह, कहते हैं, देश के सबसे पुराने और रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण समुद्री प्रवेश द्वारों में से एक है। 1885 में स्थापित इसने एक सदी से भी अधिक समय से भारत के व्यापार और आर्थिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
मोरमुगाओ बंदरगाह प्राधिकरण (एमपीए) पहले मोरमुगाओ बंदरगाह के नाम से जाना जाता था। यहां से खनिज और थोक वस्तुओं का निर्यात किया जाता है। बंदरगाह मोरमुगाओ शहर में जुआरी नदी के दक्षिणी मुहाने पर है। प्राकृतिक रूप से सुरक्षित खुला बंदरगाह है, जिसे ब्रेकवाटर और तटबंध द्वारा और भी सुरक्षित किया गया है, जिससे हर मौसम में सुरक्षित रूप से जहाजों को खड़ा किया जा सकता है। बंदरगाह की कनेक्टिविटी उत्कृष्ट है। यह अपनी रेल लाइन के माध्यम से दक्षिण पश्चिमी और कोंकण रेलवे नेटवर्क से महाराष्ट्र और कर्नाटक से जुड़ा हुआ है, जबकि राष्ट्रीय राजमार्गों के माध्यम से सड़क मार्ग माल की आंतरिक आवाजाही को सुगम बनाता है। इसका ऐतिहासिक महत्व भी है। इस बंदरगाह की उत्पत्ति 1878 की एंग्लो-पुर्तगाली संधि से जुड़ी है, जिसके तहत पुर्तगाल और ब्रिटेन ने गोवा में समुद्री व्यापार अवसंरचना को बेहतर बनाने के लिए सहयोग किया था। बंदरगाह की पहुंच अंतर्देशीय क्षेत्रों तक बढ़ाने के लिए एक मीटर-गेज रेलवे का निर्माण किया गया था, और आधुनिकीकरण के प्रयासों के परिणामस्वरूप 1885 में इसका औपचारिक रूप से उद्घाटन हुआ। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान, आपरेशन क्रीक के स्थल के रूप में मोरमुगाओ बंदरगाह रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण हो गया। गोवा की मुक्ति के बाद, इस बंदरगाह को प्रमुख बंदरगाह न्यास अधिनियम, 1963 के तहत एक प्रमुख बंदरगाह के रूप में मान्यता दी गई, जिससे यह भारत के समुद्री नेटवर्क में एक केंद्रीय केंद्र बन गया। उत्सर्जन कम करने और नवीकरणीय ऊर्जा को अपनाने के प्रयासों के चलते इस बंदरगाह को भारत का पहला मान्यता प्राप्त हरित बंदरगाह घोषित किया गया है, जिसमें विस्तार योजनाओं के साथ 3 मेगावाट का सौर ऊर्जा संयंत्रा भी शामिल है।
नौसेना विमानन संग्रहालय...
गोवा यदि जाएं तो नौसेना विमानन संग्रहालय जरूर देखें। यहां आम लोग भी जा सकते हैं। इसके लिए यहां टिकट काउंटर है। देशी-विदेशी के लिए अलग-अलग टिकट दर है। वास्को दा गामा से लगभग 6 किलोमीटर दूर बोगमालो में यह स्थित है। यहां भारतीय नौसेना का इतिहास दर्ज है। सेना के एक जवान ने बताया, जो बेशक, आगतुंकों को जानकारी देता है, 12 अक्टूबर 1998 को छह विमानों के प्रारंभिक संग्रह के साथ स्थापित किया गया था। संग्रहालय दो अलग-अलग भागों में है। एक विशाल बाहरी विमान पार्क और एक दो मंजिला आंतरिक गैलरी। बाहरी क्षेत्रा में भारतीय नौसेना की सेवा में रहे कई सेवामुक्त विमान और हेलीकाप्टर, विमान इंजन और विमानन उपकरण प्रदर्शित किए गए हैं, जिससे आगंतुक नौसेना विमानन प्रौद्योगिकी के विकास को करीब से देख सकते हैं। हमने देखा। काकपिट को देखा। उसमें कितनी जगह होती है, किस तरह पायलट उड़ान भरता है, जवान ने हमें बताया। फिर हम आंतरिक गैलरी में बम, टारपीडो, स्वचालित तोप और सेंसर जैसे नौसैनिक हथियारों पर आधारित अनुभाग में गए। वर्दी के विकास, ऐतिहासिक तस्वीरों, दस्तावेजों और यादगार वस्तुओं को देख मन रोमांचित हो उठा। प्रमुख आकर्षणों में विमानवाहक पोत आईएनएस विक्रांत और आईएनएस विराट के विस्तृत स्केल मॉडल के साथ-साथ इंटरैक्टिव और मल्टीमीडिया डिस्प्ले को देखा। छोटे-बड़े कई तरह के जहाज, उसके पार्ट्स आदि बहुत नजदीक से देखा। एक मिनट की फिल्म भी दिखाई, जिसमें नौ सेना की शक्ति, साहस और शौर्य को प्रदर्शित किया गया था।
खेतीबारी में अनुसंधान...
रांची में भी कृषि पर अनुसंधान आदि हो रहे हैं। कई संस्थाएं हैं। गोवा में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) में जाने का मौका मिला। अनुसंधान और नवाचार के बारे में जानकारी मिली। पूरा परिसर हरा-भरा और स्वच्छ दिखा। तरह-तरह के प्रयोग दिखे। नमकीन पानी के साथ खेती कैसे करें, इसका पूरा जोर इस पर रहता है। देश के करीब आठ प्रदेश समुद्र तट पर है। सो, इसका काम बढ़ जाता है। यह संस्थान इस दिशा में काम कर रहा है कि कृषि क्षेत्रा में पर्यटन को कैसे बढ़ावा दिया जाए? हो सकता है, कुछ महीनों में यह जमीन पर उतर जाए। यहां श्वेत कपिला गाय की एक नई नस्ल तैयार की गई है। इस परिसर में घूमते-घूमते सूर्य अस्त हो गया था और पैर थकान महसूस कर रहे थे। अब होटल लौटने के अलावा कोई विकल्प नहीं था।
ऐ सागर की लहरों....
अगले दिन फिर हम निकल पड़े राष्ट्रीय समुद्र विज्ञान संस्थान (सीएसआईआर-एनआईओ)। इसकी स्थापना 1966 में गोवा के डोना पाउला में हुई थी। देश का यह प्रमुख समुद्री विज्ञान अनुसंधान संस्थान है। हिंद महासागर क्षेत्रा में समुद्र विज्ञान, समुद्री जीव विज्ञान, भू-रसायन विज्ञान, भूभौतिकी और तटीय विज्ञान को बढ़ावा देने के लिए समर्पित है। पणजी के बाहरी इलाके में स्थित अपने मुख्य परिसर के साथ सीएसआईआर-एनआईओ बहुविषयक अनुसंधान करता है जो भारत की नीली अर्थव्यवस्था, पर्यावरण संरक्षण और जलवायु परिवर्तन को लेकर काम करता है। यह गोवा से आगे बंगाल की खाड़ी तक अनुसंधान का विस्तार करती है। यहां एक संग्रहालय भी है। विशाल अर्ध गोलाकार पत्थर के लंगर देखे। समुद्र के भीतर भी लाखों टन खनिज पड़ा हुआ है, जिसे बहुधात्विक पिंड कहा जाता है। व्यापक खोज के बाद भारत को हिंद महासागर में 75 हजार वर्ग किमी के एक क्षेत्रा को भविष्य में दोहन के लिए आवंटित किया गया हैै जहां सौ लाख टन से अधिक धातुएं हो सकती हैं। समुद्र के अतीत, वर्तमान और भविष्य को लेकर भी यहां लगातार अध्ययन हो रहा है। समुद्र से मिले मिट्टी के बर्तन भी यहां रखे हुए हैं। सबसे ज्यादा रुचि द्वारका के अवशेष को जानने की थी। यहां कुछ चीजें रखी गई थीं। द्वारका मंदिर की शानदार वास्तुकला ने दुनिया भर से पर्यटकों को आकर्षित किया है। इस शहर का संबंध भगवान कृष्ण से है, जिनके बारे में माना जाता है कि उन्होंने समुद्र से भूमि प्राप्त करके इस शहर की स्थापना की थी। महाभारत के ग्रंथ में भगवान कृष्ण की मृत्यु के बाद शहर के जलमग्न होने का उल्लेख है। द्वारका भारत का पहला स्थल था जहां समुद्री पुरातात्विक अन्वेषण शुरू हुआ और लगभग दो दशकों तक अध्ययन जारी रहा। द्वारका से लगभग 1 वर्ग किमी क्षेत्र में अंतर ज्वारीय क्षेत्र से लेकर 25 मीटर पानी की गहराई तक व्यापक गोताखोरी अभियान चलाए गए हैं। 3 से 16 मीटर पानी की गहराई के बीच अपतटीय अन्वेषणों के दौरान कई अवशेष खोजे गए है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी देश के ऐसे पहले प्रधानमंत्री हैं, जिन्होंने समुद्र में जाकर इस विशाल नगर के अवशेषों को देखा। यहां कई और चीजें थीं, जो चकित कर रही थीं। समुद्र में मिले हाथी के दांत ऐसा ही एक चमत्कार था। ये दांत कितने पुराने है, अभी इसका पता नहीं चल पाया है। इसके अलावा यहां और भी समुद्री जीव और समुद्र के भीतर मिले सभ्यता के अवशेष देखने को मिले। आज द्वारका समुद्र के नीचे चली गई है। जाहिर है, समुद्र का तल उ$पर आया होगा। आज भी ग्लेशियर पिघल रहा है और समुद्र का स्तर हर साल कुछ इंच उ$पर उठा रहा है। क्या पता, एक दिन समुद्र किनारे शहर उसी में समा न जाएं? आखिर, हम विकास के उस पथ पर अग्रसर हैं, जहां प्रकृति के साथ सर्वाधिक खिलवाड़ हो रहा है। विकास के इस अंधी दौड़ में कहीं मनुष्य ही लुप्त न हो जाए?
आयुर्वेद में नवाचार...
आजादी के बाद पहला अवसर है, जब सरकार पारंपरिक चिकित्सा पद्धति को बढ़ावा दे रही है। उत्तरी गोवा के पेरनेम तालुका के धारगल में अखिल भारतीय आयुर्वेद संस्थान (एआईआईए) की स्थापना की गई है। कोरोना की भयावहता सबने देखी। भारत सरकार के आयुष मंत्रालय के अधीन दिसंबर 2022 में इसे स्थापित किया गया। संस्थान आयुर्वेद की शिक्षा, अनुसंधान और रोगी देखभाल के लिए एक शीर्ष केंद्र के रूप में कार्य कर रह है। इसे एम्स की तरह विकसित किया जा रहा है। अभी इसका निर्माण जारी है। आयुर्वेद के साथ आधुनिक चिकित्सा के माध्यम से भी इलाज होता है। हर दिन यहां ओपीडी में 500 से 800 मरीज आते हैं। काफी साफ-सुथरा और खुला-खुला परिसर है। पंचकर्म, कायचिकित्सा, शल्य, शल्य और निवारक स्वास्थ्य देखभाल में विशेष चिकित्सा प्रदान करता है। यह आयुर्वेद आहार विशेषज्ञ पाठ्यक्रम, कौशल विकास कार्यक्रम और आयुर्वेद तथा संबद्ध विज्ञानों में क्षमता निर्माण को बढ़ावा देने के लिए सतत चिकित्सा शिक्षा पहल जैसे व्यावसायिक पाठ्यक्रम भी संचालित करता है। विदेशी भी यहां इलाज कराने के लिए आते हैं। यहां आनलाइन पंजीयन भी होता है। देश के किसी कोने से भी यहां पंजीयन कराकर आ सकते हैं। यहां पांच काटेज भी बने हुए हैं। सशुल्क दिया जाता है। इलाज के लिए दवाइयां निश्शुल्क दी जाती हैं। आधुनिक सुविधाओं से सज्जित इस संस्थान में शरीर व मन दोनों की चिकित्सा की जाती है और दोनों का ध्यान रखा जाता है।
क्या आपका इस गोवा से परिचय हुआ था?
तीन चार दिन की यात्रा में गोवा बीच भी देखा। बागा बीच के पास अपन ठहरे थे तो एक पूरी सांझ इस बीच पर बिताया। रात के अंधेरे में आती डराती समुद्र की लहरें और एक छोर पर बजता कानफोड़ू संगीत। नाचते-झूमते युवा। विदेशी जोड़ों की कमी नहीं थीं। आधी रात तक गुलजार सड़कें मानों नींद में जाना ही नहीं चाहतीं। पुलिस कम ही दिखी। पूरा गोवा मानो अनुशासित। हर चंद कदम पर शराब की दुकानें...क्या हम अपने झारखंड को इस तरह बना सकते हैं कि रात-रात भर पर्यटक बेखौफ घूम सकें...।
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