डा. नीरज कुमार मिश्र
झारखंड राज्य का विस्तृत पठारी भू-भाग प्राचीन ऐतिहासिक सांस्कृतिक कियाकलापों का महत्वपूर्ण केंद्र रहा है। इस संबंध में अब तक व्यापक पैमाने पर पुरातात्त्विक अवशेषों का दस्तावेजीकरण एवं शोध कार्य इस क्षेत्र में किए गए जा चुके हैं तथा अभी भी बड़े स्तर पर शोध कार्य अनेकानेक शोधार्थियों द्वारा किए जा रहे हैं। वस्तुतः औपनिवेशिक इतिहासकारों द्वारा झारखंड को 'अलगाव का क्षेत्र' के रूप में प्रस्तुत किया गया एवं इस भगौलिक क्षेत्र को किसी विशेष ऐतिहासिक सांस्कृतिक उपलब्धियों का क्षेत्र नहीं माना गया। जबकि छोटानागपुर के पठारी भाग का झारखंड क्षेत्र ऐतिहासिक सांस्कृतिक रूप से काफी उन्नत रहा है। यह विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि कई प्राचीन मुख्य व्यापारिक मार्ग एवं उपमार्ग झारखंड के क्षेत्रों से गुजरते थे। आज भी इन मार्गों पर हमें पुरास्थल, मंदिर एवं मठों के साक्ष्य सहित कई महत्वपूर्ण पुरातात्त्विक अवशेष प्राप्त होते हैं।
ओडिशा की सीमा पर स्थित, झारखंड के पश्चिम सिंहभूम में स्थित बेनीसागर स्थित छठवीं शताब्दी ईस्वी का प्रमुख शैव स्थल एवं स्थानीय राजा बेनु द्वारा निर्मित प्राचीन तड़ाग (जलाशय )अत्यंत ही महत्वपूर्ण है। यहां कई शैव मंदिरों सहित शैव मठों सहित प्रस्तर मूर्तियां एवं अन्य कलात्मक अवशेष प्राप्त हुए हैं। यह स्थल सांस्कृतिक रूप से छठवीं शताब्दी ईस्वी से सोलहवीं शताब्दी ईस्वी तक आबाद रहा एवं यहां के शैव मठों में वैदिक साहित्य, धर्म, दर्शन एवं शैव परंपरा आदि से सम्बंधित शिक्षा प्रदान की जाती थी। यह स्थल शैव संप्रदाय के पाशुपत पंथ का प्रमुख केंद्र था, जो कालांतर में तंत्र साधना का प्रमुख केंद्र बना। यहां से प्राप्त एक मृण्मय मुहर पर ब्राह्मी लिपि में अंकित (प्रियंगु धियाम चतुविद्या (चतुर्विद्या) (अर्थात प्रियंगु नामक व्यक्ति जो चतुर्विद्या में निपुण है) का महत्वपूर्ण साक्ष्य मिलता है जो इस स्थान को शिक्षा का महत्वपूर्ण केंद्र होने का प्रमाण भी है। लिपिगत अध्ययन कि दृष्टि से यह साक्ष्य पांचवीं–छठवीं शताब्दी ईस्वी का है।

झारखंड के उत्तरी भाग के कोडरमा जिले के सतगावां प्रखंड में स्थित घोड़सिमर धाम भी एक प्रमुख प्राचीन धार्मिक सांस्कृतिक केंद्र था। सकरी नदी के किनारे स्थित यह स्थान बिहार के नवादा, बिहारशरीफ एवं जमुई के समीपस्थ है। घोड़सिमर धाम में एक बड़े पुरातात्त्विक टीले का साक्ष्य है, जिसमे पकी ईंटों की संरचनाएं एवं अलंकृत स्थापत्य अवशेष बहुतायत देखे जा सकते हैं। यहां सिंहवाहिनी दुर्गा, उमा महेश्वर, विष्णु, गणेश, कार्तिकेय, सूर्य, नवग्रह पट्ट, सप्तमातृका पट्ट सहित अन्य मूर्तियां एवं शिवलिंग देखे जा सकते हैं। घोड़सिमर धाम के वर्त्तमान मंदिर एवं मंदिर परिसर में बहुसंख्यक कलाकृतियां, स्थापत्य अवशेष एवं मूर्तियां रखी गयी हैं। गर्भगृह में एक बृहदाकार शिवलिंग स्थापित है। घोड़सिमर धाम के उत्तर पूर्व में दूधपानी में आठवीं शताब्दी का महत्वपूर्ण अभिलेख है जिसमें इस क्षेत्र के प्राचीन व्यापारिक महत्व एवं इस क्षेत्र से गुजरने वाले व्यापारिक मार्ग आदि की महत्वपूर्ण जानकारी हमें प्राप्त होती है।
दक्षिण-पश्चिम छोटानागपुर के भाग गुमला जिले में स्थित दो शैव मंदिर- टांगीनाथ धाम एवं आंजन धाम अत्यंत ही महत्वपूर्ण हैं। टांगीनाथ धाम छत्तीसगढ़ एवं झारखंड के सीमा से लगे क्षेत्र के समीप है तथा यहां बहुसंख्यक शिवलिंग, प्रस्तर मूर्तियां, एकमुखी शिवलिंग, एक बावली सहित प्रस्तर मंदिर स्थापत्य की संरचनात्मक अवशेष एवं पकी ईंट की संरचना होने के पुरातात्त्विक अवशेष हैं। टांगीनाथ धाम परिसर में एक बृहदाकार लोहे का खंडित त्रिशूल भी है जिसकी तकनिकी इतनी उन्नत है कि आज तक उस पर जंग नहीं लगा। टांगीनाथ के पुरातात्त्विक अवशेष एवं मौजूदा मंदिर स्थापत्य की दृष्टि सातवीं-आठवीं शताब्दी ईस्वी का स्वीकार किया गया है। ऐसा प्रतीत होता है कि दक्षिण कोसल के रास्ते शैव धर्म के का प्रचार प्रसार इस और हो रहा था। क्योंकि अकेले गुमला के रायडीह (बासुदेवकोना ,रुद्रपुर ), पालकोट (देवगांव का मंडा धाम),बसिया (तुलसीकोना महादेव, मृत्युंजय महादेव) एवं घाघरा (देवाकी एवं आंजन धाम) में कई शैव मंदिर आज भी मौजूद हैं। पालकोट के समीप स्थित देवगांव के प्राचीन शैलाश्रय में तो इक्कीस लघु शैव मंदिरों के अवशेष हैं जो झारखंड के मंदिर स्थापत्य एवं क्षेत्र में शैव धर्म के व्यापक प्रसार एवं निरंतर विकास को दर्शाते हैं। इसी प्रकार आंजन धाम में बहुसंख्यक शिवलिंग पुरे गांव में बिखरे पड़े हैं। यहां पकी ईंट कि संरचनाएं भी मिलती हैं जो यहां एक बड़े शैव मठ होने के पुख्ता प्रमाण हैं। ये सभी प्रमाण पुरातात्त्विक दृष्टि से नवीं-दशवीं शताब्दी ईस्वी के हैं।

लोहरदगा का क्षेत्र भी शैव मंदिरों के ऐतिहासिक प्रमाणों से भरा हुआ है। लोहरदगा के कसपुर क्षेत्र में स्थित अखिलेश्वर धाम में कुल चार शैव मंदिरों के प्रमाण हैं। इसके पूर्व में दो अन्य महत्वपूर्ण स्थल हैं जिसमें एक है कुम्हारिया गांव में स्थित मठ महादेव मंदिर एवं इसके समीप पहाड़ी पर एक शैव मठ के संरचनात्मक अवशेष हैं। कुम्हारिया स्थित इसी पहाड़ी पर दो जगहों पर उत्कीर्ण प्राचीन शंख लिपि के भी साक्ष्य हैं। इसके अतिरिक्त कसपुर गांव एवं आसपास के खुले खेतों में शिवलिंग, स्थापत्य अवशेष, कैथिलिपि के शिलापट्ट सहित ईंट के संरचनात्मक अवशेष भूमि कि सतहों पर देखे जा सकते हैं। कसपुर गावं के दक्षिण में लालबहादुर शास्त्री हाई स्कूल परिसर के पास स्थित पहाड़ी के समीप कुल 12 एवं अधिक मंदिरों के संरचनात्मक अवशेष एवं प्रत्येक शैव मंदिर कि योजना देखी जा सकती है।
लोहरदगा में स्थित खखपरता का मुख्य शिव मंदिर जो कि एक पहाड़ी पर स्थित है तथा इसके समीप कई लघु शिव मंदिर बने हुए है। इसके अतिरिक्त दक्षिणी कोयल नदी के किनारे भाक्सो का शिव मंदिर प्रांगण जहां कई मंदिरों के अवशेष तथा एक उमा महेश्वर कि मूर्ति सहित कई स्थापत्य अवशेष एवं शिवलिंग प्राप्त हैं। इसके पास ही अरकोसा गांव में शिव मंदिर के अवशेष हैं। लोहरदगा के कुरु प्रखंड में दक्षिणी कोयल नदी में चट्टानी सतह एवं नदी स्थित पाषाण खंडों पर शिवलिंग उकेरे जाने के महत्वपूर्ण प्रमाण हमें प्राप्त होते हैं। यहां कैथी लिपि में एक शिवलिंग के पास दो अभिलेख भी उत्कीर्ण किये गए हैं।
छोटानागपुर के उत्तर-पूर्वी पठारी भाग के दामोदर एवं बराकर नदी क्षेत्रों में भी प्राचीन शैव धर्म के पुष्पित एवं पल्लवित होने के पर्याप्त साक्ष्य मौजूद हैं। वस्तुतः शैव धर्म की सहजता, सादगीपूर्ण ढंग की आराधना ने आम स्थानीय लोगों को प्राचीन काल से ही आकर्षित किया है। पौराणिक ग्रंथों एवं महाकाव्यों में भी शिव की सहजता एवं सौम्यता एवं साधारण भक्ति से प्रसन्न होने के अनेक कथानक हमें प्राप्त होते हैं। इस क्रम में शैव धर्म से सम्बंधित मंदिर, शिवलिंग, शैव मठ, पवित्र जलाशयों के आदि के निर्माण की चर्चा हमें कई प्राचीन शैवागम ग्रंथों में प्राप्त होता है। जब हम इनके प्राचीन पुरावशेषों एवं भौतिक साक्ष्यों की बात धनबाद एवं बोकारो के सन्दर्भ में करते हैं तो हमें कई प्राचीन शैव मंदिरों के भग्नावशेष सहित अन्य महत्वपूर्ण भौतिक प्रमाण मिलते हैं, जो इस क्षेत्र में प्राचीन काल से शैव परंपरा के सांस्कृतिक धार्मिक निरंतरता एवं लोकप्रियता को अभिव्यक्त करते प्रतीत होते हैं।
इस क्रम में यह विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि जेडी बेग्लर (जोसेफ डेविड बेग्लर) जो कि सहायक पुरात्तत्व सर्वेक्षक थे, ने 1872-73 में सर अलेकजेंडर कन्निंघम के निर्देशन में इस क्षेत्र के बड़े भाग का सर्वे किया था। इस दौरान दामोदर एवं बराकर नदी क्षेत्र एवं समीपवर्ती क्षेत्रों का ऐतिहासिक पुरातात्त्विक रिपोर्ट का प्रकाशन भी 1878 में 'रिपोर्ट आफ अ टूर थ्रू दी बंगाल प्राविन्सेस' शीर्षक से किया गया। इसमें धनबाद के पंडरा एवं बराकर नदी क्षेत्र सहित कतरास एवं बोकारो आदि के कई महत्वपूर्ण पुरातात्त्विक स्थलों एवं मंदिरों का उल्लेख किया गया है। इसमें कई महत्वपूर्ण शैव मंदिर व स्थान भी हैं, जिसमे चेचनगढ़ (अब चेचकेश्वर धाम) धनबाद के पंडरा एवं निरसा सहित कतरास में कई मंदिर अवशेष आदि कि चर्चा है।
सहायक अधीक्षण पुरातत्त्वविद
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण
रांची मंडल, रांची

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