डा. नीरज कुमार मिश्र
सहायक अधीक्षण पुरातत्त्वविद, भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण, रांची मंडल, रांची
छोटानागपुर के पठारी एवं घने वन्य क्षेत्रों के बड़े भूभाग में विस्तारित झारखंड प्रदेश के कई हिस्सों में प्रथम पूज्य भगवान् श्री गणेश की प्रस्तर प्रतिमाएं बहुतायत प्राप्त होती हैं। झारखंड से प्रतिवेदित गणेश की प्राचीन प्रतिमाएं अपने कलात्मक वैशिष्ट्य, मनमोहक स्वरूप के लिए विख्यात हैं। इन मूर्तियों के विस्तृत अध्ययन से कई महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक संदर्भों का उद्घाटन भी होता है। ये मूर्तियां धार्मिक सांस्कृतिक इतिहास के लिए तो महत्त्वपूर्ण हैं ही साथ ही कला इतिहास मर्मज्ञों के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र भी हैं। इस क्रम में झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम स्थित प्राचीन स्थल बेनीसागर में अच्छी संख्या में प्राप्त प्रस्तर निर्मित विभिन्न प्रकार की गणेश प्रतिमाएं उल्लेखनीय हैं। शैव धर्म के इस प्रमुख प्राचीन धार्मिक सांस्कृतिक केंद्र से भगवान् गणेश की एक वृहदाकार प्रतिमा अपनी कलात्मकता एवं निर्माण कौशल की पराकाष्ठा को अभिव्यक्त करता प्रतीत होता है। ऐतिहासिक संदर्भों में यहां से प्राप्त गणेश प्रतिमाओं को ओडिशा की शैलीगत स्वरूप के प्रभाव के साथ देखा जाना चाहिए। यह पुरास्थल ओडिशा की सीमा पर स्थित है। यहां से थोड़ी दूर स्थित केसना गावं जो उड़ीसा में है, यह मूर्ति निर्माण के प्रमुख केंद्र के रूप में आज भी विख्यात है। यहां आज भी विभिन्न प्रकार की एवं वृहदाकार गणेश प्रतिमाएं यहां के कुशल कारीगरों द्वारा निर्मित की जाती हैं।
वस्तुतः भगवान् गणेश पंचदेवोपासना (श्री गणेश, सूर्य, विष्णु, शक्ति, शिव) के एक प्रमुख एवं प्रथम पूज्य अग्रणी देवता हैं। अतः गणेश की प्रतिमाएं प्राचीन ऐतिहासिक संदर्भों में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण हैं। इन प्रतिमाओं को नौवीं-दसवीं शताब्दी ईस्वी के लगभग का स्वीकार किया जा सकता है। एक अन्य महत्त्वपूर्ण गणेश प्रतिमा गुमला जिले के सिसई प्रखंड में स्थित झारखंड के नागवंशी राजाओं द्वारा निर्मित उनकी राजधानी क्षेत्र नवरतनगढ़ के राजमहल एवं मंदिर परिसर में एक बड़े चट्टान पर उत्कीर्ण है। यह भी कला की दृष्टि से विशिष्ट है एवं यह मध्यकाल, लगभग सत्रहवीं शताब्दी ईस्वी में निर्मित की गई है। झारखंड में अगर प्राचीन संदर्भों में देखें तो हमें नौवीं शताब्दी ईस्वी से अठरहवीं शताब्दी ईस्वी तक की विभिन्न प्रकार की प्रस्तर निर्मित गणेश प्रतिमाएं प्राप्त होती हैं। वस्तुतः आठवीं शताब्दी के लगभग में गणेश के उपासकों का भी एक अलग संप्रदाय निर्मित हो गया जो 'गाणपत्य' कहलाये। इन्होंने एक पुराण का भी निर्माण किया जो गणेश पुराण के नाम से प्रसिद्ध है। यह ग्रंथ भगवान् गणेश की सर्वोच्च स्थिति को प्रदर्शित करता है तथा गणेश को ब्रह्मांड के निर्माता, संरक्षक और संहारक के रूप में वर्णित करता है, और उनकी तुलना महाविष्णु, सदाशिव, महाशक्ति और महाब्रह्मा के समान करता है। इस पुराण में यह भी कहा गया है कि जिस प्रकार विष्णु अवतार लेते हैं उसी प्रकार गणेश भी बार-बार लोक कल्याण के लिए अवतार लेते हैं। विष्णु, शिव एवं अन्य देवता गणेश से ही प्रादुर्भूत होते हैं और अन्त में उन्हीं में विलीन हो जाते हैं।
झारखंड के अन्य क्षेत्रों से यथा चतरा जिले के इटखोरी, चौपारण के दैहर, कोडरमा के घोरसिमर धाम, गुमला के टांगीनाथ, देवगावं, वसुदेवकोना, इसके अतिरिक्त बोकारो, पलामू आदि सहित अन्य जगहों से भी गणेश की प्रस्तर प्रतिमाएं तथा शिलाखंडों पर उत्कीर्ण गणेश प्रतिमाएं प्रतिवेदित हैं। ऐतिहासिक पुरातात्त्विक दृष्टि से झारखंड में भगवान गणेश के इन मूर्ति अवशेषों को नौवीं शताब्दी से अठरहवीं शताब्दी ईस्वी तक की धार्मिक सांस्कृतिक निरंतरता के संदर्भ में देखा जा सकता हैं। जो इस क्षेत्र में प्राचीन काल से ही भगवान् गणेश की पूजा एवं उनके प्रति धार्मिक आस्था को परंपरागत रूप में अभिव्यक्त करता है।

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