विजय केसरी, कथाकार व स्तंभकार
72 वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों में गैर-फीचर फिल्मों की श्रेणी में संथाली फिल्म 'आंगेन' के निर्देशक रवि राज मुर्मू को 'बेस्ट डेब्यू फिल्म ऑफ ए डायरेक्टर' के पुरस्कार से सम्मानित किया गया। झारखंड की जनजातीय भाषा संताली में बनी यह पहली लघु फिल्म है, जिसे राष्ट्रीय स्तर पर इतने बड़े सम्मान से अलंकृत किया गया है। आंगेन की यह सफलता झारखंड फिल्म उद्योग को राष्ट्रीय स्तर पर एक नई पहचान दिलाने में सफल हुई है। बारह मिनटों की यह लघु फिल्म इतने कम समय में कई बड़ी बातें कह डाली है। फिल्म के निर्देशक रवि राज मुर्मू ने एक छोटी सी कहानी को बड़े ही सशक्त रूप में पर्दे पर उतार कर एक बेहतर निर्देशक के रूप में प्रस्तुत किया है। सच्चे अर्थों में यह लघु फिल्म एक नया इतिहास भी रचने का काम किया है। यह पुरस्कार झारखंड फिल्म उद्योग से जुड़े कलाकारों, निर्माता निर्देशकों के लिए राष्ट्रीय स्तर पर एक नई राह खोलने का भी काम करेगा।
विचारणीय यह है कि झारखंड अलग प्रांत निर्माण के बाद कछुआ गति से चल रहा है । समय-समय पर प्रांत की सरकार झारखंड फिल्म उद्योग के विकास से संबंधित कई बातें कहती रहती हैं, लेकिन धरातल पर उतर नहीं पाती है। सबसे बड़ी विडंबना यह है कि फिल्म उद्योग से जुड़ी आधारभूत संरचना का अभी तक विकास ही नहीं हो पाया है। झारखंड फिल्म उद्योग को कोलकाता और मुंबई फिल्म उद्योग पर निर्भर रहना पड़ रहा है, जो काफी महंगा भी है । वहीं दूसरी ओर झारखंड के फाइनेंसर प्रांत के निर्माणाधीन फीचर फ़िल्म में पैसा ही नहीं लगाना चाहते हैं। अगर कोई फाइनेंसर आगे आते भी है, तो अपनी मुट्ठी बहुत खींच कर रखते हैं, जिस कारण उम्दा फिल्में बन नहीं पाती हैं। इससे फिल्म से जुड़े कलाकारों, तकनीशियनों और निर्देशकों को ढंग से पारिश्रमिक भी नहीं मिल पाता है।
झारखंड के सरकारी और सहकारी कोऑपरेटिव बैंक भी फिल्म निर्माण हेतु फाइनेंस करने के प्रति पूरी तरह उदासीन बने रहते हैं। जबकि सैकड़ो की संख्या में प्रांत के फिल्मकार फिल्म के निर्माण हेतु वित्त पोषण के लिए बैंकों आवेदन लंबित पड़े हुए हैं। फिल्मकार बैंक दौड़ते - दौड़ते थककर फिल्म निर्माण की इच्छा ही छोड़ देते हैं। अर्थात झारखंड फिल्म उद्योग गहरे वित्तीय संकट के दौर से गुजर रहा है। आंगेन की यह उपलब्धि झारखंड फिल्म निर्माण से जुड़े लोगों के लिए एक वरदान साबित होगा। जबकि झारखंड के कई कलाकार तकनीशियन और निर्देशक इस प्रांत से बाहर निकाल कर अपनी प्रतिभा दिखाने में सफल रहे हैं। अगर इन प्रतिभाओं को झारखंड फिल्म उद्योग में काम करने का अवसर मिलता तो अपनी प्रतिभा को और भी बेहतर ढंग से प्रस्तुत कर पाते।
यह लिखते हुए गर्व महसूस होता है कि भारतीय सिनेमा के इतिहास में यह पहला मौका है, जब किसी संथाली भाषा में बनी लघु फिल्म को राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार प्राप्त होने का यह गौरव प्राप्त हुआ है। झारखंड में फिल्मी प्रतिभाओं की कोई कमी नहीं है। लेकिन जो प्रोत्साहन यहां के कलाकारों को मिलना चाहिए नहीं मिल पा रहा है। इस कारण यहां की प्रतिभाओं को एक साथ कई नई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। इस दिशा में अन्य प्रांतों की तरह झारखंड सरकार को भी आगे आने की जरूरत है । रवि राज मुर्मू की पढ़ाई - लिखाई झारखंड के जमशेदपुर में हुई। उन्होंने फिल्म निर्माण से जुड़े प्रशिक्षण मुंबई तथा अन्य प्रसिद्ध फिल्म निर्माण संस्थाओं से प्राप्त किया। प्रारंभ में उन्होंने झारखंड से ही फिल्म निर्माण का काम शुरू किया था। लेकिन अपेक्षित सहयोग नहीं मिल पाने के कारण मुंबई चले गए। वहां उन्होंने फिल्म निर्माण का अनुभव तथा बहुत सारा काम किया। आगे उन्होंने झारखंड के जमशेदपुर से फिल्म निर्माण का काम शुरू किया। वे अपनी कड़ी मेहनत और लगन की बदौलत इस क्षेत्र में आगे बढ़ते चले जा रहे हैं।
'आंगेन' लगभग बारह मिनट दस सेकंड की एक लघु फिल्म है यह लघु फिल्म आदिवासी समाज की संस्कृति, लोककथाओं और रोजमर्रा के जीवन संघर्षों पर आधारित है। देश की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु द्वारा यह पुरस्कार प्रदान किया गया, जिससे झारखंड और संथाली सिनेमा का मान बढ़ा है। यह रेखांकित करता है कि संथाली फिल्म 'आंगेन' को राष्ट्रीय स्तर पर मिली पहचान से क्षेत्रीय कथा कला और आदिवासी संस्कृति को बढ़ावा मिलेगा। आंगेन एक संथाली शब्द है, जिसका अर्थ अदृश्य होता है। इस फिल्म की कहानी झारखंड की एक पारंपरिक लोक कथा पर आधारित है। फिल्म की कहानी झारखंड के एक संथाली बालक बांसुरी वादक चरवाहा सुकू के इर्द-गिर्द घूमती है। सुकू अपने गांव में मवेशी चराता है । वह बहुत ही मधुर बांसुरी बजाता है। सांवला रंग का वह बालक जितना अच्छा बांसुरी बजाता है, उसका मन भी उतना ही निर्मल होता है, उसकी निर्मलता उसके चेहरे से साफ-साफ झलकती भी है। सुकू की बांसुरी की धुन इतनी मनमोहक होती है कि जल स्रोत के पास रहने वाली आकाश लोक की एक अलौकिक देवी उससे मोहित हो जाती है। वह देवी अपनी शक्तियों और पानी के रास्ते उस चरवाहे को अपनी अलौकिक और वैभवशाली आकाश लोक में ले जाती है, जहां उसे सारे ऐशो-आराम मिलते हैं।
आगे की कहानी है कि कई वर्षों तक दिव्य लोक में सुकू को रहने बाद उसका मोहभंग होता है । वह किसी तरह अपनी धरती व जड़ों की याद में वापस पृथ्वी पर लौटता है, तो पाता है कि उसका पुराना, अपना गांव और समाज पूरी तरह बदल चुका है या अदृश्य सा हो गया है। यह लोककथा आधुनिकता की अंधी दौड़ और अपनी सांस्कृतिक जड़ों, भाषा व पहचान से दूर होते जा रहे युवाओं के महानगरों की ओर पलायन का एक दार्शनिक और प्रतीकात्मक रूप है। इसी दृश्य के साथ यह फिल्म यहीं पर समाप्त होती है।
इस छोटी सी कहानी में लघु कथा के लेखक बहुत बड़ी बात कहने की कोशिश की है। जन्मभूमि से जुड़े रहने की बात ही कुछ और होती है। आज भौतिकतावादी और आधुनिकता ने लोगों को एक भ्रम में डाल दिया है । इसी भ्रम के दौड़ में मनुष्य बिना परिणाम जाने अपनी जन्मभूमि से पलायन कर जाता है। महानगरों में कुछ वर्षों तक रहने के बाद जब वह विचारता है, तो पाता है कि जन्म भूमि का त्याग कर उसने अच्छा नहीं किया। उसे अपने व जड़ की याद सताने लगती है। वह महानगर छोड़ने का निर्णय ले लेता है। तब तक काफी देर हो चुका होता है । जब वह अपनी जन्मभूमि पर दस्तक देता है, पूरी स्थितियां बदली हुई नजर आती है। इस कथा के लेखक इस फिल्म के माध्यम से यह भी आह्वान करना चाहते हैं कि लोग अपनी जड़ों से जुड़कर रहें। यहां की मिट्टी, संसाधन, भाषा और संस्कृति के साथ पले और बढ़ें। अपनी मिट्टी की बेहतरी के सोचें और लगातार कुछ करते रहे।
यह 72 वां राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों का वितरण 22 सितंबर 2026 को गुजरात के एकता नगर, केवड़िया में संपन्न हुआ। इस कार्यक्रम में देश के राष्ट्रपति द्रोपदी मुर्मू बतौर मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित हुईं। इस कार्यक्रम को राष्ट्रीय स्तर पर संपन्न होने वाले फिल्म उद्योग का सबसे महत्वपूर्ण और बड़ा कार्यक्रम के रूप में जाना जाता है। आयोजित इस कार्यक्रम में वरिष्ठ अभिनेता अनंत नाग को भारतीय सिनेमा में पांच दशक से अधिक समय तक योगदान के लिए दादासाहेब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया गया। सर्वश्रेष्ठ फीचर फिल्म के लिए आर्टिकल 370 को सम्मानित किया गया। सर्वश्रेष्ठ लोकप्रिय फिल्म के लिए कल्कि 2898 एडी को सम्मानित किया गया। वहीं सर्वश्रेष्ठ अभिनेता के लिए कार्तिक आर्यन, फिल्म 'चंदू चैंपियन' और ममूटी,मलयालम फिल्म 'ब्रह्मा युगम' दोनों को संयुक्त रूप से सम्मानित किया गया। सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री के तौर पर यामी गौतम,फिल्म 'आर्टिकल 370' के लिए सम्मानित किया गया ।सर्वश्रेष्ठ निर्देशन के तौर पर राजकुमार पेरियासामी, तमिल फिल्म 'अमरन' के लिए सम्मानित किया गया। सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता के तौर पर संजय मिश्रा, हिंदी फिल्म 'भक्षक' के लिए सम्मानित किया गया।
इस खास अवसर पर राष्ट्रपति द्रोपदी मुर्मू ने लोकप्रिय कलाकारों और मशहूर हस्तियों से अपील की कि वे बच्चों और युवाओं पर अपने बड़े प्रभाव का उपयोग स्वस्थ और अनुशासित जीवनशैली को बढ़ावा देने के लिए करें, तथा स्वास्थ्य के लिए हानिकारक पदार्थों, जैसे तंबाकू, गुटका आदिका विज्ञापन या समर्थन करने से बचें। आगे उन्होंने कहा कि विभिन्न भाषाओं और क्षेत्रों की फिल्में भारत की जीवंत छवि, विविध भाषाओं, परंपराओं, आकांक्षाओं और संघर्षों का सजीव चित्रण करती हैं।

Comments (0)
Write first comment
Please Login to write comment