हिमकर श्याम
वरिष्ठतम लेखक, पद्मश्री डॉ. रामदयाल मुंडा के गुरु तथा मेरे अत्यंत आत्मीय और श्रद्धेय डॉ. बिमलाचरण शर्मा आज 99 वर्ष के हो गए हैं। उनका जीवन झारखंड के इतिहास, भूगोल, जनजातीय समाज और संस्कृति के गहन अध्ययन के साथ-साथ अदम्य जिजीविषा, आत्मनिर्भरता और जीवन के प्रति अटूट आस्था की प्रेरक गाथा है।
डॉ. बिमलाचरण शर्मा झारखंड के भूगोल, मानवशास्त्र और जनजातीय जीवन के गंभीर अध्येता, शिक्षक और लेखक रहे हैं। उन्होंने भूगोल, मानवशास्त्र और हिंदी में एम.ए. की उपाधियां प्राप्त करने के साथ बी.एल. (1971) तथा पीएच.डी. (1978) की उपाधियाँ भी अर्जित कीं। रांची विश्वविद्यालय के भूगोल विभाग में प्रोफेसर तथा समाजशास्त्र के व्याख्याता के रूप में लगभग चार दशकों तक उन्होंने अध्यापन किया। जून 1992 में विश्वविद्यालय प्रोफेसर के पद से सेवानिवृत्त होने के बाद भी उनका अध्ययन, पठन-पाठन और लेखन निरंतर जारी रहा।
झारखंड के समाज-संस्कृति के अध्येता
डॉ. शर्मा ने झारखंड को केवल एक भौगोलिक क्षेत्र के रूप में नहीं देखा, बल्कि इसकी धरती, इतिहास और प्राकृतिक परिवेश के साथ यहाँ के जनजातीय समाज की जीवन-पद्धति, सामाजिक संरचना, अर्थव्यवस्था, परंपराओं और सांस्कृतिक चेतना को भी गहराई से समझा। उनके दर्जनों शोध-निबंध तथा दो दर्जन से अधिक ग्रंथ प्रकाशित हुए हैं।
उनकी प्रमुख कृतियों में ‘ए मुंडा विलेज’, ‘ट्राइबल ज्योग्राफी’, ‘छोटानागपुर का भूगोल’, ‘झारखंड की जनजातियां’, ‘झारखंड : भूमि और भूमिपुत्र’, ‘झारखंड की आदिम जनजातियां’, ‘छोटानागपुर : यूनिटी इन डाइवर्सिटी’ तथा ‘जियोग्राफी ऑफ क्राउन’ आदि उल्लेखनीय हैं। ‘कल्चरल छोटानागपुर : यूनिटी इन डाइवर्सिटी’ के संपादित ग्रंथ में उनका निबंध भी विशेष रूप से उल्लेखनीय है। देशभर की पत्र-पत्रिकाओं में उनकी असंख्य रचनाएं प्रकाशित हुई हैं।
उनकी लेखनी में जनजातीय समाज को केवल तथ्यों और आँकड़ों के माध्यम से देखने के बजाय उसकी मानवीय संवेदनाओं और सांस्कृतिक आत्मा को समझने का प्रयास दिखाई देता है। प्रकृति के साथ जनजातीय समुदायों के गहरे संबंध, उनकी सामाजिक संस्थाओं, परंपराओं और जीवन-मूल्यों का उन्होंने गंभीर अध्ययन किया। इस दृष्टि से उनका लेखन झारखंड के सामाजिक-सांस्कृतिक इतिहास को समझने के लिए महत्त्वपूर्ण संदर्भ-सामग्री बन गया है।
शोध से रचनात्मक साहित्य तक
उनकी रचनात्मकता शोध और अकादमिक लेखन तक सीमित नहीं रही। उनका कहानी-संग्रह ‘अपराजिता’ उनके संवेदनशील साहित्यिक व्यक्तित्व का परिचायक है, जिसमें जीवन-अनुभव, मानवीय संवेदनाएं और सामाजिक यथार्थ कथा के माध्यम से अभिव्यक्त हुए हैं। शोधपरक लेखन के साथ रचनात्मक साहित्य में उनकी सक्रियता उनके व्यापक साहित्यिक व्यक्तित्व को रेखांकित करती है।
झारखंड की जनजातियां : एक महत्त्वपूर्ण संदर्भ-कृति
डॉ. शर्मा की चर्चित पुस्तक ‘झारखंड की जनजातियां’ झारखंड की बत्तीसों जनजातियों के जीवन के विविध पक्षों का विस्तृत और अंतरंग परिचय प्रस्तुत करती है। इसमें जनजातीय समाज के इतिहास, संस्कृति, परंपराओं, सामाजिक जीवन, आर्थिक परिस्थितियों और मानवीय संवेदनाओं को समग्रता में समझने का प्रयास किया गया है। संताल, मुंडा, उरांव, हो, बिरहोर, असुर और पहाड़िया जैसी प्रमुख जनजातियों सहित विभिन्न समुदायों के विशिष्ट सामाजिक-सांस्कृतिक स्वरूप का इसमें अध्ययन मिलता है।
इस पुस्तक की विशेषता जनजातीय जीवन की बाहरी संरचना के साथ उसकी आंतरिक संवेदना और सांस्कृतिक चेतना को समझना है। इसलिए यह विद्यार्थियों, शोधार्थियों और जनजातीय क्षेत्रों में कार्यरत लोगों के लिए उपयोगी संदर्भ-कृति है।
पुस्तक का प्रथम संस्करण 2006 में क्राउन बुक डिपो से प्रकाशित हुआ था और 2022 में ‘झारखंड झरोखा’ से इसका पुनर्मुद्रण हुआ। समय बीतने के बावजूद झारखंड के जनजातीय समाज को उसकी विविधता और विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान के साथ समझने में इसकी उपयोगिता बनी हुई है।
उनकी पुस्तक ‘झारखंड की आदिम जनजातियां’ भी अत्यंत महत्त्वपूर्ण और प्रामाणिक कृति है, जिसका ‘झारखंड झरोखा’ से 2022 में पुनर्मुद्रण हुआ। इसी क्रम में उनकी पुस्तक ‘झारखंड : भूमि और भूमिपुत्र (परिचयात्मक एवं तुलनात्मक)’ भी उल्लेखनीय है। मानवशास्त्रीय और समाजशास्त्रीय दृष्टि से रची गई इस कृति का प्रथम संस्करण 2011 में प्रकाशित हुआ था, जबकि वर्ष 2022 में ‘झारखंड झरोखा’ से इसका पुनर्मुद्रण हुआ।
जीवन स्वयं एक प्रेरक पुस्तक
लेकिन डॉ. शर्मा की सबसे बड़ी और जीवंत पुस्तक शायद उनका अपना जीवन है। स्वतंत्रता संग्राम एवं जेल-यात्रा से लेकर राइफल शूटिंग, स्काउट और एनसीसी तक के अनुभवों में उनके जीवन के साथ एक पूरा युग चलता दिखाई देता है। संघर्षों और बदलते समय को निकट से देखने वाले डॉ. शर्मा ने जीवन के हर दौर को सीख और अनुभव में बदला।
गंभीर बीमारी और हृदय की बाईपास सर्जरी जैसी स्वास्थ्य चुनौतियों के बावजूद उन्होंने जीवन के प्रति अपनी आस्था नहीं छोड़ी। 99 वर्ष की आयु में भी उनकी स्मृति, जिज्ञासा और जीवन के प्रति उत्साह प्रभावित करता है। उनके व्यक्तित्व में उम्र की थकान से अधिक अनुभव की ऊर्जा दिखाई देती है।
रांची के मोरहाबादी में उनका अपना घर है। जीवन के कई वर्ष उन्होंने बरियातू स्थित एक वृद्धाश्रम में भी बिताए। घर होते हुए भी वृद्धाश्रम को अपना ठिकाना बनाना उनके सहज स्वभाव और आत्मनिर्भर जीवन-दृष्टि का परिचायक रहा। पिछले वर्ष गंभीर रूप से अस्वस्थ होने के बाद स्वास्थ्य संबंधी परिस्थितियों के कारण वे पुनः मोरहाबादी स्थित अपने घर लौट आए।
जिजीविषा का जीवंत उदाहरण
99 वर्ष की आयु में डॉ. बिमलाचरण शर्मा ज्ञान, संघर्ष और जिजीविषा के जीवंत प्रतीक हैं। झारखंड के भूगोल और जनजातीय समाज पर उनका शोध जितना महत्त्वपूर्ण है, उतना ही प्रेरक उनका जीवन-संघर्ष है। उनका जीवन संदेश देता है कि उम्र शरीर की सीमा हो सकती है, जिज्ञासा, कर्म और जीवन-उत्साह की नहीं।
इस विलक्षण व्यक्तित्व के 99वें जन्मदिन पर उन्हें सादर प्रणाम और हार्दिक शुभकामनाएं। ईश्वर उन्हें स्वस्थ, सक्रिय, प्रसन्न और दीर्घायु रखें।

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